राहुल ढोलकिया वहीं हैं जिन्होनें गोधरा कांड के बाद भड़की हिंसा पर आधारित फिल्म परज़ानिया बनाई थी. अब उन्होनें कश्मीर समस्या पर आधारित फिल्म लम्हा बनाई है. राहुल का कहना था कि यह फिल्म कश्मीर की सच्चाई को बयान करेगी परंतु फिल्म देखने के बाद ऐसा लगता नहीं है. पूरी फिल्म के दौरान कहीं भी नहीं लगता कि यह फिल्म कश्मीर की मूल सच्चाई को बयान कर रही हो. फिल्म में नाटकीयता की भरमार है और वास्तविकता कोसों दूर लगती है.
सेना के खुफिया विभाग का अधिकारी विक्रम (संजय दत्त) एक गुप्त मिशन के तहत कश्मीर घाटी जाता है. सेना को खबर मिलती है कि कश्मीर में कोई बडी घटना होने वाली है और उसकी जाँच विक्रम को सौपी जाती है. विक्रम को आजिजा (बिपाशा बसु) मिलती है जो कट्टरपंथी नेता हाजी (अनुपम खेर) की भतीजी है और फातिमा ब्रिगेड की मेजर.
अपने मिशन पर विक्रम अजीजा का विश्वास जीतता है और उसके करीब आता है. अंत में वह एक फिल्मी हीरो की तरह उसे बचाता है और सच्चाई का पता लगाता है.
इस फिल्म को बनाने के पीछे जो मेहनत की गई है वह प्रशंसनीय है. फिल्म के लोकेशन अच्छे हैं और जेम्स फाउल्ड्स की सिनेमेटोग्राफी भी लाजवाब है. बिपाशा ने अपने पात्र में जान डालने की कोशिश की है. परंतु अनुपम खेर के आगे सभी का अभिनय फिका पड़ जाता है. अनुपम मूलत: कश्मीरी ही हैं और उन्होने अलगाववादी नेता के पात्र के साथ पूरा न्याय किया है. फिल्म का संगीत भी मधुर है.
फिल्म की कमी है पटकथा जो कि बेहद कमजोर है. मध्यांतर से पहले फिल्म में जान लगती है परंतु मध्यांतर के बाद यह एक मसाला फिल्म बन जाती है. पटकथा बेहद कमजोर है और क्लाइमैक्स एकदम साधारण. कुणाल कपूर भावहीन अभिनय करते है और संजय दत्त पर अब उम्र का असर दिखने लगा है.
इस फिल्म में अलगाववाद, पाकिस्तान प्रेम, इस्लाम, पंडितो की आवाज, राजनीति, जेहाद, बच्चों को आतंकी ट्रेनिंग आदि सभी विषयों को छूने की कोशिश की गई है. फिल्म के कुछ दृश्य वाकई में बेहद शानदार हैं, परंतु पूरी तरह से देखा जाए तो फिल्म दिशाहीन है.
इस फिल्म के लिए 1 रेटिंग ही दी जा सकती है परंतु अनुपम खेर के शानदार अभिनय की वजह से हम दे रहे हैं 2.
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