Monday, Feb 13th

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खट्टा मीठा - समीक्षा - सब खट्टा नहीं मीठा

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khatta-mithaजब प्रियदर्शन और अक्षय कुमार मिले तो समझ सकते हैं कि बडे पर्दे पर कोई धमाका होने वाला है. आखिर हेराफेरी, दे दना दन, भागम भाग से चला आ रहा अनुभव तो यही कहता है. इसलिए जब दर्शक खट्टा मीठा देखने जाते हैं तो उनके मन में कोई शंका नहीं होती. यह फिल्म भी प्रियदर्शन की एक और धमाकेदार कॉमेडी फिल्म होनी थी, परंतु जब फिल्म खत्म हो जाती है तो दर्शक सवालों से घिरा हुआ होता है... फिल्म की कहानी क्या थी? क्या यह फिल्म प्रियदर्शन ने ही बनाई है या उनके किसी सहायक ने? आखिर अक्षय कुमार ऐसी किसी फिल्म में काम कैसे कर सकते हैं? स्पष्ट है - खट्टा मिट्ठा वह एक और फिल्म है जो जिससे इस वर्ष काफी उम्मीदें थी और जो उम्मीदों पर बिल्कुल भी खरी नहीं उतर पाई.

खट्टा मिट्ठा कहानी है सचिन टिचकुले [अक्षय कुमार] और भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ उसकी जंग की. उसे गलत बात बर्दास्त नहीं होती और वह सच्चाई के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार होता है. सच्चाई के लिए ही कॉलेज के दिनों में वह अपनी प्रेमिका गहना [त्रिशा] को भी खो देता है जो बाद में उसके समक्ष म्यूनिसिपल कमिश्नर के रूप में आती है.

बहरहाल पेशे से रोड कोंट्राक्टर सचिन सच्चाई के साथ काम करना चाहता है परंतु भ्रष्ट तंत्र में फंस कर वह भी रिश्वत देने लग जाता है. क्योंकि सच्चाई की पहरेदारी पहले से गरीब सचिन को रोड पर ला देती है और उसके पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के भी पैसे नहीं बचते. अपने कर्मचारियों, जिसे कि वह अपना परिवार मानता है, की सलाह पर सचिन हर वह काम करने लगता है जिससे वह कभी परहेज करता था. पूरी फिल्म भ्रष्टाचार और उससे लड़ाई पर केन्द्रीत रहती है.

इस फिल्म में अगर कुछ देखने लायक है तो वह है अक्षय कुमार का अभिनय. अक्षय ने इस फिल्म को अपने कंधों पर उठाए रखा है. उन्होनें अपने पात्र में जान डाली है परंतु वह काफी नहीं है. यही बात असरानी, जॉनी लीवर और कुलभुषण खरबंदा के लिए भी कही जा सकती है. इन तीनों का अभिनय लाजवाब रहा है, परंतु इससे फिल्म को कोई लाभ नहीं पहुचता. फिल्म के कुछ दृश्य वाकई में बेहद हंसाते हैं जैसे कि असरानी का एक साथ तीन लोगों से बात करना, जॉनी लीवर का रोडरोलर ठीक करना आदि. परंतु दुर्भाग्य से इतना काफी नहीं है.


फिल्म की सबसे बडी कमजोरी है कहानी. पता ही नहीं चलता कि आखिर निर्देशक कहना क्या चाहते हैं. उतनी ही कमजोर पटकथा भी है जो पूरी फिल्म के दौरान झोल खाती रहती है. ऐसा लगता है मानो कोई पूरी कहानी थी ही नहीं और टुकडों को जोडकर पूरी कर दी गई. और टुकडे भी ऐसे जो दोहराते ही जाते हैं. चाहे वह पूल का टूटना हो, अक्षय कुमार और त्रिशा की खटपट हो, अक्षय की बहन की कहानी हो या भ्रष्ट नेताओं पर कटाक्ष हो. नीरज वोरा, अरूणा इरानी, मिलिंद गुणाजी जैसे मंजे हुए कलाकारों का इस फिल्म में ठीक से उपयोग ही नहीं किया गया, जो कि अखरता है.

तो अंत में यही कह सकते हैं कि खट्टा मीठा एक कमजोर फिल्म है. ना तो यह एकदम कॉमेडी फिल्म है ना ही एकदम गम्भीर फिल्म. शायद प्रियदर्शन भी नहीं जानते थे कि वे आखिर बना क्या रहे हैं.

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