अनिल कपूर और राजश्री ओझा को बधाई देनी होगी उन्होनें एक ऐसी उपन्यास के ऊपर फिल्म बनाने की अच्छी कोशिश की है जो आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व लिखी गई थी. वह उपन्यास थी एम्मा, जिसे जेन ऑस्टिन ने लिखा था.
ऐसा नहीं है एम्मा के ऊपर आधारित यह पहली फिल्म है. इस उपन्यास को आधार बनाकर अनगिनत फिल्में बन चुकी हैं परंतु लगभग सभी ने कुछ प्लोट ही लिए कभी पूरी उपन्यास को फिल्मी पर्दे पर उकेरने का प्रयास नहीं किया. और यह असम्भव सा भी है. राजश्री ने अच्छी कोशिश की पर फिर भी उपन्यास को फिल्म में ढालना मुश्किल तो होता ही है.
आयशा एक ऐसी लडकी की कहानी है जिसके पास करने को कुछ नहीं है परंतु उसे हर किसी की जिंदगी में दखल देने का मानो शौख है. आयशा [सोनम कपूर] रिश्ते बनाती है, लोगों को मिलाती है और यही उसका पेशा भी है और शौख भी. आयशा अपनी मित्र पिंकी (इरा दुबे) के साथ मिलकर एक सीधी सादी लड़की शैफाली (अमृता पुरी) को एक आधुनिक लडके रणधीर गंभीर (सायरस साहूकार) से मिलाती है. रणधीर को शैफाली पसंद आ जाए इसके लिए वह हर सम्भव प्रयास करती है. इस बीच उसकी मुलाकात अर्जुन (अभय देओल) से होती है जो उसके एकदम उलट है. दोनों पूरी फिल्म के दौरान लड़ते ही रहते है. अंत आते आते आयशा को अहसास होता है कि वास्तव में वह कितनी अकेली है और वह जो करना चाहती है वह हमेशा ठीक ही नहीं होता है.
इस फिल्म को महिला केन्द्रीत फिल्म कह सकते हैं. इसकी पटकथा, स्टाइलिंग, निर्देशन, कला निर्देशन सबकुछ महिलाओं के हाथ में रहा है और प्रमुख पात्र भी महिलाएँ ही हैं. सोनम कपूर में कितनी प्रतिभा है यह इस फिल्म से पता चलता है. यही बात इरा दूबे और अमृता पुरी के लिए भी कहनी चाहिए. इन तीनों ने कमाल का अभिनय किया है. अभय देओल इस तरह की फिल्मों के सुपर स्टार हैं. साइरस भी अपने पात्र में जमते हैं.
फिल्म का संगीत काफी कर्णप्रिय है. राजश्री ओझा का निर्देशन बढिया है. इस फिल्म में दिल्ली की "सोश्यल लाइफ" को काफी अच्छी तरह से उजागर किया गया है. स्टाइलिंग जबरदस्त है और परिधान भी आकर्षक हैं.
फिल्म की कमजोरी है इसकी पटकथा. यूँ तो पटकथा में कोई खास झोल नहीं है परंतु उपन्यास के साथ न्याय करने के चक्कर में फिल्म की लम्बाई काफी बढ गई है. वैसे फिल्म 2 घंटॆ के आसपास की है परंतु फिर भी यदि इसकी लम्बाई 15-20 मिनट कम होती तो फिल्म की रोचकता कई गुना बढ जाती.
आयशा एक ऐसी फिल्म है जिसे ब्लॉकबस्टर फिल्म नहीं कहा जा सकता. यह कला और कोमर्शियल फिल्म का मेल है. इसमें मसाला भी है और कुछ हद तक सार्थकता भी. यह फिल्म छोटे बजट से बनाई गई है और यही इस फिल्म की सबसे बडी पूंजी है. वह इसलिए क्योंकि सैटेलाइट राइट्स और संगीत अधिकार बेच कर फिल्म ने अपनी लागत लगभग वसूल कर ली है. बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म धमाका तो नही करेगी परंतु सामान्य हिट हो सकती है. इस फिल्म को लेकर हाइप भी है.
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