"नाम ही काफी है?". आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म है तो उम्मीदें अपने आप चार गुना बढ जाती है. जब दर्शक थिएटर में जाते हैं तो यह बात मन में लेकर जाते हैं कि फिल्म अच्छी ही होगी क्योंकि यह आमिर खान की फिल्म है.
यह हमेशा सच नहीं भी होता है और हो भी नहीं सकता परंतु यह जरूर सच है कि आमिर खान उन गिने चुने निर्माताओं में से हैं जो अपनी फिल्म की गुणवत्ता को लेकर बेहद सवेदनशील रहते हैं. पीपली लाइव भी निराश नहीं करती. पीपली लाइव एक ऐसी फिल्म है जो मनोरंजन के साथ एक संदेश भी देती है. यह "शानदार" फिल्म तो नहीं कही जा सकती परंतु "अच्छी" जरूर है.
स्वार्थ के आगे इंसान कितना बेबस हो जाता है यह कहानी है पीपली लाइव की. भ्रष्ट सरकारी तंत्र, टीआरपी की भूखी मीडिया, स्वार्थी परिवारजन और एक अकेला नत्था. नत्था उन किसानों का प्रतिनिधित्व करता है जो आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं, सिर्फ यह सोचकर कि शायद उनके मरने के बाद उनके परिवारवाले सुखी रह पाएँ.
कहानी है मुख्यप्रदेश के गाँव पीपली की. नत्था [ओमकारदास माणिकपुरी] एक किसान है जो बैंक का कर्ज़ नहीं चुका पाता और उसकी जमीन जब्त होने की नौबत आ जाती है. नत्था की दुनिया ही उजड़ जाती है और उसके तथा उसके परिवार वालों के पास खाने को भी कुछ नहीं रह जाता है. नत्था का भाई बुधिया [रघुवीर यादव] नत्था को आत्महत्या करने के लिए उकसाता है. एक बेहुदी सरकारी योजना बुधिया को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करती है. योजना के अनुसार आत्महत्या करने वाले किसान के परिवार वालों को मुआवजा मिलता है. नत्था की पत्नी, माँ, बेटा सब बुधिया के समर्थन में खड़े हो जाते हैं. एक स्थानीय अखबार को जब यह पता चलता है तो उसे लगता है कि यह तो बडी खबर है. धीरे धीरे राष्ट्रीय चैनलों को भी इसका पता चलता है और वे अपने लाव-लश्कर के साथ पीपली गाँव में डेरा डाल देते हैं. अब नत्था एक खबर बन जाता है. वह कैसा दिखता है, क्या सोचता है, क्या करता सब कुछ एक "खबर" बन जाती है. नेताजी भी मौके का फायदा उठाने नत्था के पास उपहार लेकर आ जाते हैं.
इस फिल्म के जरिए एक बडी सामाजिक और राजनितिक समस्या को सटीक तरीके से प्रदर्शित किया गया है. यहाँ इंसान की कीमत शून्य हो जाती है और स्वार्थ समाज पर हावी हो जाता है. निर्देशक अनुषा रीजवी जो कि एक पत्रकार रह चुकी हैं ने इस विषय का गहन अध्ययन किया है और यह इस फिल्म में प्रदर्शित भी होता है. फिल्म की पटकथा अच्छी है और कुछ दृश्य तो बेहद लाजवाब हैं. नत्था के बेटे के द्वारा अपने पिता को आत्महत्या करने के लिए कहना, एक पत्रकार द्वारा नत्था का पीछा शौच स्थल तक करना, नत्था के भाई बुधिया का समझाना कुछ ऐसे दृश्य हैं जो कमाल के बने हैं.
नत्था के पात्र में रंगमंच कलाकार ओमकार दास ने जान डाल दी है. स्वार्थी भाई बुधिया के रूप में रघुवीर यादव भी जमते हैं. शालिनी वत्स ने नत्था की पत्नी की भूमिका बहुत ही बढिया तरीके से निभाई है. बाकी कलाकारों ने भी अच्छा अभिनय किया है. यह अनुषा रीजवी की बतौर निर्देशक पहली फिल्म है परंतु ऐसा लगता नही है.
फिल्म गम्भीर विषय पर आधारित है परन्तु कोशिश की गई है कि इसमें कुछ मसाला भी डाला जाए ताकी उन लोगों को भी फिल्म देखने में मजा आए, जो इस तरह के विषय वाली फिल्मों से दूर ही रहते हैं. फिल्म का धुआँधार प्रचार किया गया है और इससे यह छोटॆ बजट की फिल्म भी बडी फिल्मों की श्रेणी में आ गई है. फिल्म के 600 से अधिक प्रिंट रिलीज किए गए हैं और लगता तो यही है कि यह फिल्म आमिर खान बैनर की एक और हिट फिल्म होगी.
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