भारत में जब भी कोई होरर फिल्म बनती है तो फार्मूले पहले से ही तय होते हैं. अत्याचार सहन करने के बाद मृत्यु को प्राप्त होने वाली महिला [अमूमन] बदला लेने के लिए वापस आती है और किसी के शरीर में दाखिल होकर अपने दुश्मनों का खात्मा करने लगती है. फिल्म का हीरो किसी तांत्रिक [आजकल इनकी जगह साइकोथेरेपिस्ट लेने लगे हैं] की मदद से अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड को बचा लेता है. तो एक तरह से देखा जाए तो हैल्प भी एक होरर फिल्म है और बॉलिवुड की भूतिया फिल्म व्याख्या को ही आगे बढाती है. इसमें कुछेक "हटके" तत्व जरूर हैं परन्तु फिर भी फिल्म उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाती.
विक [बॉबी देओल] और पिया [मुग्धा गोडसे] अपने वैवाहिक जीवन से नाखुश हैं. उन्हें पिया के बिमार पिता को देखने अचानक मोरिशस आना होता है. यहाँ मुग्धा अपने पुराने घर जाती है और उसे कुछ अजीब सा होने लगता है. पिया की जुडवा बहन की आत्मा पिया के शरीर में दाखिल होकर उसके नजदीकी लोगों को मारने लगती है. विक अपनी पत्नी को बचाने के लिए एक पेरासायकोलोजिस्ट आदित्य [श्रेयास तलपडे] की मदद लेता है. अंत आते आते विक यह पता लगा लेता है कि आखिर पूरा माजरा क्या है?
फिल्म का प्लोट अच्छा है और इस पर आधारित एक अच्छी फिल्म बनाने की सम्भावना थी, परंतु ना जाने क्यों पटकथा लेखकों ने बीच बीच में स्थापित फार्मूले डालने की कोशिश की. फिल्म का क्लाइमैक्स भी हजम हो ऐसा नहीं है. बॉबी देओल बहुत दिनों बाद सोलो फिल्म कर रहे हैं और उन्होने अच्छा अभिनय किया है. मुग्धा गोडसे आकर्षक लगी हैं. उनके बिकीनी दृश्यों की चर्चा पहले से ही है. परंतु उन्होनें अभिनय भी काफी अच्छा किया है.
श्रेयास तलपडे भी जमते हैं, उनके पात्र को क्लाइमैक्स से पहले ना जाने क्यों अचानक से विदा कर दिया जाता है और पूरा ध्यान बॉबी के पात्र पर डाल दिया जाता है. ऐसा शायद यह दिखाने के लिए किया गया हो कि असली हीरो बॉबी हैं श्रेयास नहीं. जो भी हो परंतु इससे फिल्म में झोल आ जाता है.
हैल्प एक टाइमपास फिल्म है. इसमें एकाध-दो डरावने दृश्य भी हैं और कुछ रोमांचक पल भी. एक बार देख सकते हैं.

