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लफंगे परिंदे - समीक्षा - सपनों की उड़ान और लफंगागिरी

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lafngay-parindeयह विशुद्ध मुम्बईया फिल्म है जिसे मुम्बईकर तो पसंद कर सकते हैं परंतु अन्य जगहों के दर्शक कितना पसंद करेंगे यह कहना मुश्किल है.


टशन, दिल बोले हडिप्पा और बदमाश कम्पनी की नाकामयाबी के बाद यशराज फिल्मस के लिए यह फिल्म काफी महत्वपूर्ण हो गई है. यह फिल्म प्रदीप सरकार ने बनाई है जिनकी पिछली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ढेर हो गई थी. इसलिए उनके लिए भी यह फिल्म काफी महत्वपूर्ण है. यही हाल नील नीतिन मुकेश का है जिन्हें अभी तक यह साबित करना बाकी है कि वे सोलो फिल्म में भी चल सकते हैं.

लफंगे परींदे मुम्बई के चॉल की कहानी हैं जहाँ सपने बनते और बिखरते हैं और सबकुछ बस एक पल में हो जाता है. नंदू [नील मुकेश] एक बॉक्सर है और उसे वन नॉक मैन कहा जाता है क्योंकि उसका बस एक ही पंच काफी होता है. दूसरी तरफ पिंकी है जिसके सपनों की दुनिया उसे प्रसिद्धि के द्वार तक ले जाती है और उसका इरादा इंडियाज़ गोट टेलैंट शो को जीतकर अपने सपनों को हकीकत में बदलना है. परंतु बदलती तो उसकी जिंदगी है जब नंदू की कार से टक्कर उसकी आँखों की रोशनी छीन लेती है. इस दुर्घटना से नंदू का भी हृदय परिवर्तन हो जाता है और वह अब नैत्रहीन पिंकी के सपने पूरे करने की कोशिश करता है.

यह एक मसाला फिल्म है इसलिए दर्शकों का एक खास वर्ग इसे पसंद करेगा. यूँ तो इसे रोमांटिक एक्शन फिल्म कहा गया है, परंतु एक्शन वास्तव में काफी कम है और जो है भी वह खराब सम्पादन की वजह से मजाकिया बन गया है. परंतु फिल्म की गति तेज है और फिल्म में कॉमेडी, रोमांस और एक्शन का तालमेल बनाया गया है, जिससे यह फिल्म बोझिल नहीं लगती.

दीपिका पादुकोण ने फिल्म के प्रचार के दौरान कहा था कि उन्होनें नैत्रहीन लडकी की भूमिका निभाने के लिए काफी मेहनत की है, परंतु उनकी मेहनत पर्दे पर दिखाई नहीं देती. दीपिका नैत्रहीन लड़की की तरह नहीं लगती, वे अपना प्रभाव छोडने में नाकामयाब रही हैं. नील मुकेश में प्रतिभा है परंतु उन्हें अपने हावभावों को और अधिक प्रदर्शित करना होगा. कई बार वे भावहीन लगने लगते हैं. फिल्म का संगीत फिल्म के साथ जाता है. प्रदीप सरकार का निर्देशन भी अच्छा है.

लफंगे परींदे का भविष्य लोगों की राय पर जाता है. थिएटर से निकलते दर्शक मिश्र प्रभाव के साथ लौट रहे हैं. ये दो दिन फिल्म के लिए काफी महत्वपूर्ण है. यह फिल्म यशराज को असफलताओं के लम्बे सिलसिले से बाहर ला सकती है, परंतु फिल्म के दर्शकों के मन की बात जान पाना मुश्किल है.

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