Monday, Feb 13th

अंतिम अपडेट:04:05:04 AM IST

आशाएं - समीक्षा - सार्थक बोझिल फिल्म

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aashayein11नागेश कुकुनूर गम्भीर किस्म की फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं. उनकी
फिल्मों में संदेश छिपा होता है. उनकी यह नई फिल्म भी एक संदेश देती है -
जीवन को जीने का, उसका आनंद उठाने का और हर परिस्थिति में खुश रहना सीखने
का संदेश.

नागेश की यह फिल्म पिछले दो साल से बनकर तैयार थी परन्तु रिलीज अब हुई
है. परंतु इसे देख कर ऐसा नहीं लगता कि यह पुरानी फिल्म है.

राहुल [जॉन एब्राहिम] जुए में करोडों रूपए जीतता है और अब उसे जीवन
खुशियों से भरा लगने लगता है. वह अपनी गर्लंफ्रेंड नफिसा [सोनल सहगल] से
विवाह करने के सपने संजोता है. परंतु तभी उसे पता चलता है कि उसे कैंसर
है. और उसके सारे सपने टूट जाते हैं और वह स्वयं भी. वह खुद को नफिसा से
दूर ले जाता है.

कैंसर कल्याण केन्द्र में उसकी मुलाकात एक 17 वर्षीय लड़की पद्मा [अनाहिता
नायर] से होती है. उसके साथ मिलकर वह लोगों के बीच खुशियाँ बांटता है.
उसकी जिंदगी बदल जाती है. परंतु एक दिन पद्मा की मृत्यु हो जाती है और
राहुल फिर से निराशा में घिर जाता है और खुद को मौत के करीब पाता है.

आशाएँ जीवन की आशाओं और निराशाओं के बीच घुमती है. यह फिल्म हमें बताती
है कि जीवन की सच्चाई क्या है, कैसे हम निराशाओं के बीच भी आशाओं को ढूंढ
सकते हैं.

जॉन एब्राहिम इस फिल्म की खोज हैं. उन्होने पहली बार इतनी सशक्त भूमिका
निभाई है. अनाहिता नायर भी प्रभावित करती हैं.

यह फिल्म धीमी है और बोझिल लग सकती है. फिल्म का नाम आशाएँ है परंतु
फिल्म देखने से उदासीनता छाने लगती है.

सार्थक फिल्मों के प्रसशंकों के लिए बहुत अच्छा विकल्प है आशाएं.

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