यह एक ऐसा वायरस है जिसकी चपेट में आने वालों में 70% लोगों की मृत्यु तय मानी जाती है. यह वायरस “सेंड-फ्लाय’ नामक किड़े के काटने से फैलता है. यह किड़ा मिट्टी के घरों में या जिन घरों के आंगन मिट्टी के होते है उनकी दरारों में पनपता है. इसके अलावा जहरीले हो चुके खाद्य पदार्थों से भी फैलता है.
कैसे मिला नाम
चंडिपुरा वायरस सबसे पहले 1965 में महाराष्ट्र में दिखाई दिया था. चंडिपुरा नामक गाँव के दो व्यक्तियों के रक्त के नमूनों की जाँच में यह वायरस पाया गया, तब से इसे चंडिपुरा वायरस कहा जाने लगा.
घातक हमलावर
इस वायरस के ज्यादातर शिकार यानी लगभग 80% तक बच्चे ही होते है. माना जाता है कि महाराष्ट्र व दक्षिण गुजरात में अब तक इस वायरस से 250 बच्चों की मौत हो चुकी है. 2003 में गुजरात में इस वायरस ने 329 लोगों को चपेट में लिया था, जिसमें 183 लोगों की मृत्यु हो गई.
रोग के लक्षण
इस वायरस से होने वाली बिमारी के लक्षण दिमागी बिमारी मेनिंजाइटिस से मिलते जुलते होते है. फ्लू से होने वाले बुखार जैसी बुखार आने के बाद वह दिमाग में चढ़ जाती है. मरीज को उल्टी व दस्त होते है, सर में दर्द होता है. खिंचाव महसूस होता है और रोग के बढ़ जाने से वह कोमा में चला जाता है.
बचाव के लिए घर व आसपास के क्षेत्र तथा बालकों को स्वच्छ रखने की सलाह दी जाती है.

