पहले हम आपस में सम्पर्क बनाए रखने के लिए चिट्ठी लिखा करते थे, और अब उसकी जगह धीरे धीरे ईमेल ने ले ली है. आजकल चिट्ठियाँ लिखने का दौर धीरे धीरे खत्म हो रहा है और अब उसकी जगह या तो मोबाइल फोन की बातचीत ले रही है या फिर ईमेल.लेकिन इसके साथ ही लोगों के व्यवहार में भी बदलाव आ रहा है. चिट्ठी की बजाय ईमेल लिखने से लोग अधिक झूठ बोलने लग गए हैं. कुछ मनोचिकित्सकों का अनुमान है कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि ईमेल लिखने वाले व्यक्ति को ऐसा आभास होता है कि वह ईमेल प्राप्त करने वाले व्यक्ति से दूर है. यह एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव है.
रट्ज़र्स बिजनेस स्कूल के शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग के द्वारा यह जानने की कोशिश की कि इस धारणा के पीछे कितनी सच्चाई है. उन्होनें 48 विद्यार्थियों को चुना और सभी को 89$ दिए. उन विद्यार्थियो को कहा गया कि उन्हें यह रकम एक अन्य मित्र के साथ साझा करनी है. वह मित्र कौन है यह उन्हें नहीं बताया गया. यह भी कहा गया कि उस मित्र को आपकी पहचान नहीं हो पाएगी और आप उससे कभी मिलोगे भी नहीं. यही नहीं भले ही उनको 89$ दिए गए हों परंतु सामने वाले मित्र को यही पता है कि हर विद्यार्थी को 5% से लेकर 100% तक मिले हैं. किसको कितने मिले हैं यह उन्हें पता नहीं है.
हर विद्यार्थी को कहा गया कि आपको उस मित्र को चिट्ठी लिखकर यह बताना है कि उन्हें कितने पैसे मिले हैं जो वे साझा करेंगे. इसके बाद कुछ विद्यार्थियों ने ईमेल के द्वारा सूचना दी और कुछ ने चिट्ठी लिखकर. जिन विद्यार्थियों ने ईमेल लिखी थी उनमें से 92% विद्यार्थियों ने रकम को लेकर झूठ बोला, जबकि जिन लोगों ने चिट्ठी लिखी थी उनमें से 63% विद्यार्थियों ने ही झूठ बोला.
इस बारे में एक शोधकर्ता का कहना है कि - ईमेल को अस्थायी और गैर सम्पर्क माध्यम के तौर पर लिया जाता है. ईमेल लिखने वाले व्यक्ति उसूलों के विषय में कम सोचते हैं. और इसलिए ईमेल लिखते समय झूठ लिखने की प्रवृति अधिक देखने को मिलती है.

