वाद विवाद और चर्चा अच्छे नतीजे लेकर आ सकती है. कई ऐसे मसले हैं जो अंत मे बातचीत से ही सुलझाए जाते हैं. लेकिन दुनिया में कई ऐसे मुद्दे भी हैं जिनपर वर्षों से चर्चा होती आई है लेकिन आजतक कोई सर्वमान्य जवाब नहीं मिल पाया है, और बहुत सम्भव है कभी मिल भी ना पाए. ऐसे ही पाँच विवादित सवाल :मानव किसकी पैदाइश? उत्क्रांति की या ईश्वर की?
धर्मगुरू और वैज्ञानिक इस मसले पर भिडते रहे हैं. मानव की उत्पत्ति आखिर कैसे हुई? क्या सचमुच में आदम और ईव का अस्तित्व था ? यह विवाद सदियों पुराना है.
लगभग सभी धर्मों में ईश्वरीय सत्ता को सर्वोच्च माना गया है, सृष्टि की संरचना इश्वर द्वारा की गई मानी जाती रही है. हिन्दू धर्म के अनुसार ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना हुई थी जिसके पालन की जिम्मेदारी विष्णु की है और नष्ट करने की शिव की. दुनिया के एक भू-भाग में चर्च की सत्ता किसी राजघराने से भी बडी हुआ करती थी. जब लोग यह मानते थे कि पृथ्वी ही अंतरिक्ष का केन्द्र है. जब लोग पृथ्वी को ईश्वर का उपहार और “सात दिन का निर्माण” मानते थे. तब वह "आदम और ईव" की व्याख्या विकसित हुई थी. आज भी लोग इन मिथकों में विश्वास रखते हैं.
वहीं चार्ल्स डार्विन और अन्य वैज्ञानिकों की धारणा है उत्क्रांतिवाद की. विज्ञान मानता है कि आज का इंसान उत्क्रांति के क्रमिक विकास का नतीजा है. परंतु सच क्या है?
मृत्युदंड, हाँ या नहीं?
यह एक और विवादित विषय है. प्राचीन काल में [और आज भी कुछ देशों में] आँख के बदले आँख का सिद्धांत मान्यता में था.
कोई इंसान किसी की जान ले ले तो उसको भी अपनी जान देनी पडेगी, यह मृत्युदंड कहलाता है. लेकिन क्या सभ्य समाज को किसी की जान लेने का अधिकार है, भले ही वह अपराधी हो? दुनिया के कई देशों मे मृत्युदंड वर्जित है. क्या उन देशों की सोच सही है? क्या एक ऐसे इंसान को जिवित रखना ठीक है, जिसके लिए मानव जीवन का कोई मूल्य ना हो?
नैतिकता क्या होती है?
यह भी विवादित प्रश्न है, भले ही कभी हम इस विषय को गम्भीरता से ना लेते हों. किसी एक व्यक्ति की नैतिकता दूसरे पर लागू नहीं होती क्योंकि दोनों के विचार अलग अलग होते हैं. तो नैतिकता के सर्वमान्य सिद्धांत क्या है? एक चोर किसी का पर्स चुराकर भागता है तो वह “चोर” है और नैतिक रूप से गलत है, लेकिन जब हम पाइरेटेड सीडी खरीद कर फिल्म देखते हैं तो क्या हम “चोर” नहीं हैं?
किसी अन्य की पत्नी के साथ सहशयन एक समाज में अनैतिक तो दूसरे में सामान्य है, यानी कि नैतिकता भी इंसान दर इंसान और समाज दर समाज बदलती रहती है. क्या कोई सर्वमान्य नैतिक मापदंड हो सकते हैं?
नैतिकता क्या होती है?
यह भी विवादित प्रश्न है, भले ही कभी हम इस विषय को गम्भीरता से ना लेते हों. किसी एक व्यक्ति की नैतिकता दूसरे पर लागू नहीं होती क्योंकि दोनों के विचार अलग अलग होते हैं. तो नैतिकता के सर्वमान्य सिद्धांत क्या है? एक चोर किसी का पर्स चुराकर भागता है तो वह “चोर” है और नैतिक रूप से गलत है, लेकिन जब हम पाइरेटेड सीडी खरीद कर फिल्म देखते हैं तो क्या हम “चोर” नहीं हैं?
किसी अन्य की पत्नी के साथ सहशयन एक समाज में अनैतिक तो दूसरे में सामान्य है, यानी कि नैतिकता भी इंसान दर इंसान और समाज दर समाज बदलती रहती है. क्या कोई सर्वमान्य नैतिक मापदंड हो सकते हैं?
जीवन की शुरूआत कब? माँ के पेट से या जन्म लेने के बाद?
गर्भपात सामान्य स्थितियों में वर्जित होता है. गर्भपात यानी किसी जिवित जीव की हत्या करना जो कि नैतिक रूप से गलत है. लेकिन जीव को जिवित कब माना जाए?
धर्मशास्त्र माँ के पेट में विकसित हो रहे भ्रुण को जीवन मानते हैं, लेकिन चिकित्सक माँ के पेट से बाहर आए नवजात शिशु को जीवन की शुरूआत मानते हैं. सोचिए जब हम अपने बच्चों का जन्मदिन मनाते हैं तो क्या वह 9 महीने गिनते हैं जो वह बच्चा माँ के पेट में गुजारता है? नहीं. तो फिर जीवन की शुरूआत कब से मानी जाए?
आखिरी अनुत्तरित सवाल, क्या ईश्वर है? तथा ईश्वर क्या है?
आखिरी अनुत्तरित सवाल, क्या ईश्वर है? तथा ईश्वर क्या है?
जब से हम बने हैं तब से यह सवाल जिवित है, और इस सवाल का जवाब ना आज हमारे पास है, ना कल होगा. ईश्वर वास्तव में है या मात्र हमारी कल्पना है? ईश्वर अगर है तो उसका स्वरूप क्या है?
क्योंकि हम मानव ईश्वर को उसी रूप में देखते हैं जैसे कि हम खुद हैं, क्योंकि हमारी कल्पना उसके आगे नही जा सकती. लेकिन क्या किसी ने ईश्वर को सचमुच में देखा है? ईश्वर की मौजूदगी को आखिर कैसे परिभाषित किया जाए?
