भारत विविधताओं से भरा देश है जहाँ अलग अलग संस्कृतियों का संगम होता है. यहाँ कई धर्मों, मान्यताओं और रीति-रिवाजों को मानने वाले तथा अलग अलग भाषाएँ बोलने वाले लोग रहते हैं. अब तक हम यही मानते आए थे कि देश में बोली जाने वाली सभी भाषाओं के बारे में हमारे पास जानकारी उपलब्ध है. परंतु कुछ भाषा विशेषज्ञों ने अरूणाचल प्रदेश के सुदूर दुर्गम इलाके में बोली जाने वाली एक ऐसी भाषा खोज निकाली है जिसके बारे में अब तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी.
नेशनल ज्योग्राफी के एक प्रोजेक्ट के तहत अनजानी भाषाओं की खोज कर रहे ग्रेगरी एंडरसन, डेविड हैरिसन और गणेश मुर्मु ने भारत सरकार से विशेष अनुमति लेकर अरूणाचल प्रदेश के उन इलाकों का दौरा किया जो तिब्बत और चीन के एकदम करीब है. वहाँ काफी कम संख्या में लोग रहते हैं. अब तक की जानकारी के अनुसार वहाँ के लोग अका और मिजि नामक भाषाएँ बोलते हैं. परंतु अपने प्रवास के दौरान इस दल ने पाया कि कुछ बुजुर्ग एक ऐसी भाषा बोल रहे थे जो पहले कभी सुनी नहीं गई.
और इस तरह से एक नई भाषा पर से पर्दा उठा. इस भाषा को कोरो कहते हैं और एक अनुमान के अनुसार करीब 800 लोग इस भाषा को समझते और बोलते हैं तथा वे सभी बुजुर्ग हैं. एक समाचारपत्र ने एंडरसन का व्यक्तव्य छापा है जिसमें उन्होनें कहा है - "यदि हम इस इलाके में 10 वर्ष बाद जाते तो हमें इस भाषा के बारे में पता ही नहीं चलता क्योंकि तब तक इस भाषा को बोलने वाले सभी लोग सम्भवत: इस दुनिया से जा चुके होते".
कोरो भाषा अका और मिजि भाषाओं से काफी अलग है. इस दल के एक सदस्य डेविड हैरिसन के अनुसार - "कोरो, अका या मिजि का ही अलग रूप नहीं है. यह एकदम नई भाषा है. अका और मिजि से यह भाषा उतनी ही अलग है जितनी अंग्रेजी से जापानी."
जानकारों का मानना है कि कोरो का मूल स्रोत तिब्बती भाषा हो सकती है और वहीं से यह आई है.
उदाहरण के लिए सुअर को अका भाषा में "वो' कहा जाता है जबकि कोरो में उसे "लेले" कहा जाता है. फर्क सिर्फ शब्दों में ही नहीं पूरे व्याकरण में भी है. परंतु इस भाषा की लिपि के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई है क्योंकि इस भाषा का लिखित प्रमाण नहीं मिला है. इस भाषा को बोलने वाले लोग लिख नहीं सकते, उन्हें मात्र यह भाषा बोलनी आती है.
एक अनुमान के अनुसार हर 15 दिन में दुनिया की कोई ना कोई बोली या भाषा विलुप्त हो जाती है. फिलहाल दुनिया में 9000 से अधिक भाषाएँ बोली जाती है.
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