Monday, May 21st

अंतिम अपडेट:04:05:04 AM IST

7 अनोखे और अनजाने राज़ आँखो के

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eyeहमारी आँखे दुनिया को देखने का माध्यम है. आँखे नहीं होती तो यह दुनिया भी ऐसी नहीं होती. क्या हम हमारी आँखों का पुरा इस्तेमाल करते हैं? क्या हम इसके बारे में सारी जानकारी रखते हैं? शायद नहीं. बहुत गहराई में ना जाएँ तो भी कुछ ऐसी सामान्य बातें है जो अमूमन हमारे ध्यान में नहीं आती.

दृष्टि हमेशा एक जैसी नहीं रहती
चाहे आप कितनी भी कसरत करते हों या पोष्टिक आहार लेते हों आपकी आँखों की रोशनी उम्र के साथ कमजोर होगी ही. 45 वर्ष की उम्र के बाद इंसान की आँखों की देखने की शक्ति क्षीण होने लगती है. इस उम्र से पहले तक इंसान नजदीक रखी चीजों को आसानी देख सकता है और पढ सकता है. परंतु फिर उसे अपनी आँखों के लैंस को अधिक घुमावदार बनाने की आवश्यकता पडने लगती है. पहले वह चीजों को थोडा दूर रखकर देखता है (या पढता है). परंतु अंत में उसे ऐनक का सहारा लेना पडता है.

बच्चों की आँखें कमजोर होती हैं
हमारी आँखे जन्म के 7 वर्ष तक विकसित होती रहती हैं. इसलिए इसस कम उम्र के बच्चों की आँखें कमजोर हैं या नहीं यह ठीक ढंग से कह पाना मुश्किल हो जाता है. सच तो यह है कि इस उम्र से पहले किसी व्यक्ति की आँखें कितनी स्वस्थ है यह अनुमान आम तौर पर नहीं लगाया जा सकता है. एक वयस्क व्यक्ति अपनी आँखों का जिस तरह से इस्तेमाल कर सकता है, छोटे बच्चे नहीं कर पाते.

आधुनिक कैमरे आँखों के आगे कुछ नहीं
अभी आप अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन पर यह पढ रहे हैं. अब आप तुरंत खिडकी की तरफ देखिए. आपने खिडकी को स्पष्ट रूप से देखा? उत्तर हाँ होगा. क्या आपने महसूस किया आपकी आँखो के लैंस ने अपनी स्थिति बदल कर फोकस को ठीक किया था. यह सब हमारे ध्यान मे कभी नही आते परंतु अपने आप होता रहता है. आप किसी भी आधुनिक कैमरे को इतनी तेजी से खुद को स्थिति के अनुसार बदलते हुए नहीं पाएंगे. हमारी आँखे एक अजुबा है.

आँखे खोलती है मधुमेह का राज़
टाइप 2 मधुमेह की पहचान करना कठीन होता है और आम तौर पर व्यक्ति इसकी पहचान नहीं कर पाता. मधुमेह का यह प्रकार उम्र बढने पर शरीर पर असर करता है. परंतु इसकी पहचान आँखों की जाँच कराने के दौरान हो सकती है. इसकी वजह से आँखों के पीचे के भाग की रक्त धमनियों में जमाव देखा जा सकता है.

हम दिन में 15 हजार बार पलकें झपकाते हैं
हमें यह महसूस नही होता परंतु हम दिन मे करीब 15000 बार पलकें झपकाते हैं. एक और चीज जो गौर करने लायक वह यह कि यह वह शारीरिक क्रिया है जिसे हम नियंत्रित कर सकते हैं. यानी कि आप चाहकर अपनी दिल की धडकनों को धीमा या तेज नही कर सकते परंतु आप चाहें तो पलकें कभी भी झपका सकते हैं. पलकें झपका कर हम आँखों को गिला रखते हैं.

आँखो का कद एक जैसा रहता है
जन्म के बाद से हमारे शरीर के अंग बडे होने तक बढते रहते हैं परंतु आँखो का कद एक जैसा रहता है.

आँखे नही दिमाग देखता है
और अंत में - आँखे देखती नही है. आँखो का काम केवल चीजों से टकराकर परावर्तित हो रही रोशनी और उससे सम्बंधित जानकारियों को दिमाग तक पहुँचाना है. यह दिमाग के दृश्य कोर्टॆक्स होते है जो इस जानकारी को समायोजित कर इनका अर्थ निकालते हैं और हमें "समझाते" हैं कि हम क्या देख रहे हैं. हमारी आँखे इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण भाग निभाती है, परंतु वह देखती नही है.

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