Monday, May 21st

अंतिम अपडेट:04:05:04 AM IST

कभी इदी अमीन के हाथों बेघर हुए थे लाखों भारतीय

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idi-aminअप्रवासी भारतीय हमारे देश के लिए दुनिया भर में राजदूत का काम करते हैं. देश की संस्कृति और विकासगाथा को दुनिया के कोने कोने मे पहुँचाने और देश के विकास मे इनका योगदान भारत के लिए गौरव की बात है. तरकश.कॉम इन अप्रवासी भारतीय लोगों से जुडी कुछ जानी कुछ अनजानी बातों को अपनी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है.

बात उस जमाने की है जब भारत ब्रिटिश राज की गुलामी की जंजीरों मे जकडा हुआ था. उस समय ईस्ट इंडिया कम्पनी और अँग्रेज शासक भारत से गुलामों और बंधुआ मजदूरों को को मोरिशियस, अफ्रीकी देशों और वेस्ट इंडीज़ के टापुओं पर खेती व अन्य कार्यों के लिए भेजा करते थे.

ब्रिटिश राज की जडें पृथ्वी के लगभग हर भूभाग पर मौजूद थी. ब्रिटिश राज अपने साम्राज्य को विद्रोहियों एवं अन्य प्रतिकारी तत्वों से बचाने के लिए मार्ग व्यवस्था और रेल नेटवर्क बिछाने मे लगी हुई थी. भारत के कोने कोने में रेल लाइनें बिछाई जा रही थी, उसी तरह से अफ्रीकी देशों मे रेल लाइन बिछ रही थी. केन्या के मोम्बासा और युगांडा के कम्पाला शहरों को जोडने के लिए एक लम्बी रेल लाइन बिछाने का प्रस्ताव भी था. यह रेलवे ट्रेक करीब 1000 किलोमीटर लम्बा होने वाला था और इसका बिछाया जाना लगभग असम्भव था क्योंकि इसके रास्ते में सवाना के जंगल और दुर्गम खाडियाँ आने वाली थी.

लेकिन ब्रिटिश राज किसी भी कीमत पर इन दोनों अफ़्रीका देशों को जोडने वाली रेलवे लाइन बिछाने को तत्पर थी. इसके लिए दिसम्बर 1895 में करीब 30,000 भारतीय मजदूरों को जहाजों की द्वारा पूर्वी अफ़्रीका पहुँचाया गया. और इन मजदूरों को इस दुर्गम रास्ते पर रेलवे लाइन बिछाने मे मदद करने को कहा गया. इस प्रोजेक्ट के शुरू होने के बाद भारतीय मजदूर अमानवीय परिस्थितियों में अपार यातनाएँ सहकर रेलवे लाइन बिछाने मे लगे रहे. इस दौरान करीब 2500 मजदूर भूख, बिमारी और अत्यधिक परिश्रम के चलते मारे गए. इसमें से करीब 150 मजदूर तो सवाना के जंगल में शेर और अन्य जंगली जानवरों के शिकार बने थे.

आखिरकार इंजिनीयरिंग की दृष्टि से असम्भव मानी गई यह परियोजना मूर्तरूप बनी लेकिन इसमें भारतीय मजदूरों द्वारा किए गए अथाह परिश्रम का कहीं उल्लेख नही आया और उनके योगदान को भूला दिया गया.

युगांडा गए इन भारतीय मजदूरों मे से कई लोग वहीं स्थाई रूप से बस गए. और बरसों बाद उनके कई रिश्तेदार और अन्य भारतीय लोग भी इन देशों में व्यापार करने के लिए चले गए.

वर्षों बाद 2 फरवरी 1971 को युगांडा के तत्कालीन सेना प्रमुख इदी अमीन ने प्रधानमंत्री अबोते को सत्ता से निष्कासित कर सत्ता पर कब्जा कर लिया और युगांडा का तानाशाह बन गया. इदी अमीन एक सिरफिरा शासक था जो इस अफ्रीकी देश मे अपनी सत्ता को और मजबूत करने के लिए अफ्रीकी मूल के लोगों की भावनाओं को भडका रहा था. इन लोगों को बताया जाता कि किस तरह से भारतीय मूल के लोग इनके सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए अवरोध बन रहे हैं.

उस समय भारतीय मूल के लोग युगांडा में अकूट सम्पति अर्जित कर चुके थे और कई कपडा मिलों, कारखानों और चीनी फैक्ट्रियों मे उनका पैसा लगा हुआ था. इदी अमीन ने भारतीय लोगों को 90 दिन मे देश छोडने को कहा. उसकी दलील यह थी कि वर्षों पहले भारतीय लोग ब्रिटिश सरकार के कोंट्राक्ट पर रेलवे लाइन बिछाने आए थे, वह काम अब पूरा हो चुका है इसलिए इन्हे चले जाना चाहिए. उसने भारतीय लोगों को मात्र 55 पाउंड साथ मे ले जाने के अनुमति दी. इस तरह से करीब 70000 भारतीय मूल के लोगों को अपना सबकुछ छोडकर युगांडा से जाना पडा. उनमें से कई लोग भारत वापस आ गए थे और कई ब्रिटेन और कनाडा मे स्थाई हो गए थे.
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