बात उस समय की है जब भारत के व्यापारी सिल्क रूट के माध्यम से मध्यपूर्विय देशों और यूरोपीय देशों के बीच व्यापार करते थे. भारतीय व्यापारी मध्य पूर्व के देशों का व्यापार करने और वहाँ व्यापारिक यात्राएँ करने के लिए सिल्क रूट नामक मार्ग से यात्राएँ करते थे. जैसे जैसे समय बीतता गया कई भारतीय व्यापारी इस लम्बे मार्ग के आसपास आए हुए इलाकों मे स्थाई निवास भी करने लग गए थे.19 वीं सदी के आते आते कई मध्यपूर्वी शहरों जैसे कि बुखारा, कन्दहार, समरकन्द, काशगर वगैरह मे भारतीय मूल के हिन्दू व्यापारियों की अच्छी खासी तादाद रहने लगी थी. इन सभी व्यापारियों ने वहाँ के जन जीवन को अपना भी लिया था. उनका खान पान और रहन सहन वहाँ के शहरों मे रहने वाले मूल निवासियों जैसा ही हो चुका था लेकिन मूलत: वे हिन्दू थे और अपनी धार्मिक मान्यताओं मे वे गहरा विश्वास रखते थे.
लेकिन किसी परिजन की मृत्यु होने पर उन्हे सैनिकों के साये मे अग्निसंस्कार करना पडता था. इसके पीछे वजह यह थी कि इन मध्यपूर्वी शहरों मे मुस्लिम शासकों का शासन था और अधिकतर प्रजा भी मुस्लिम थी. इन शहरों मे मुस्लिम कानून चलते थे और अग्निसंस्कार पर प्रतिबंध था. हिन्दू व्यापारियों और सौदागरों को अपने परिजन की मृत्यु होने पर अग्निसंस्कार करने के लिए सरकार के पास से विशेष अनुमति लेनी पडती थी. लेकिन उसके बाद भी स्थानीय प्रजा के साथ किसी भी प्रकार का घर्षण टालने के लिए वे सरकार से सैनिक सहायता मांगते थे.
इसके बाद वे अग्निसंस्कार की प्रथा को जल्द से जल्द निबटाते थे और पूरी विधि के दौरान सैनिको के साये मे रहते थे.

