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अहमदिया सम्प्रदाय और पाकिस्तान: इतिहास और वर्तमान

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ahmediyyaसबके लिए प्रेम, नफरत किसी के लिए नहीं. यह मूलमंत्र है अहमदिया आंदोलन का.

अहमदिया मुस्लिम सम्प्रदाय की स्थापना मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने 1889 में की थी. मिर्जा गुलाम अहमद का मानना था कि वे ईश्वर के द्वारा चुनी गई संतान हैं जो सभी धर्मो का प्रतिनिधित्व करते हैं. वे अपने आपको आदम के समकक्ष और उनका जुड़वा भाई की तरह मानते थे. आदम का जन्म छट्ठे दिन के समाप्त होते हुआ था तो मिर्ज़ा गुलाम अहमद का जन्म कुरान के भविष्यकथन के हिसाब से 6ठी सदी के के अंतिम वर्षों में हुआ था.

इस्लाम, ईसाई धर्म, और यहुदी धर्म में आदम को ऐसा पहला इंसान माना जाता है जिसके साथ ईश्वर ने बात की और उन्हें प्रथम पैगम्बर भी माना जाता है. परंतु अहमदिया मुस्लिम सम्प्रदाय इस बात पर यकीन नहीं रखता.

दूसरी तरफ अहमदिया सम्प्रदाय बाईबल में वर्णित सभी पैगम्बरों, ईशु, जॉन द बापिस्ट और मुहम्मद के अलावा ज़ोरोस्टर, कृष्ण, बुद्ध, कंफ्यूसियस और गुलाम अहमद को भी पैगम्बर का दर्जा देता है.

इतिहास:
अहमदिया सम्प्रदाय की नीवं मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने 1889 में रखी थी. गुलाम अहमद की मृत्यु के बाद हकीम नूरूद्दीन ने उनकी जगह ली. उनके बाद मिर्ज़ा बशीरूद्दीन महम्मद अहमद के चुनाव के समय यह सम्प्रदाय दो भागों में विभाजित हो गया. एक धडे ने मिर्ज़ा बशीरूद्दीन महम्मद अहमद के नैतृत्व में विश्वास व्यक्त किया परंतु दूसरे धड़े ने अहमदिया कौंसिल को प्रमुख माना.

1914 में हुए इस विभाजन से अहमदिया सम्प्रदाय और लाहौर अहमदिया मुवमेंट नामक दो भाग बने. लाहौरी धड़े ने घोषणा की कि मिर्ज़ा गुलाम अहमद के परिवार का कोई भी सदस्य खलिफा के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता. यह बात मुख्य अहदिया सम्प्रदाय को मंजूर नहीं थी. लाहौरी अहमदिया मुवमेंट का मानना है कि मुहम्मद से पहले और उनके बाद कोई पैगम्बर नहीं हुआ और इसलिए गुलाम अहमद के दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

एक दूसरा मतभेद यह था कि जहाँ अहमदिया सम्प्रदाय का मानना था कि किसी भी ईश्वर के दूत [गुलाम अहमद भी] में यकीन ना रखने वाला काफीर है, वहीं लाहौरी मूवमेंट का मानना था कि जो व्यक्ति कलमा स्वीकार करता है वह मुस्लिम है भले ही वह गुलाम अहमद में यकीन करे या नहीं.

बहरहाल अहमदी सम्प्रदाय भी इस्लाम की लगभग सभी मान्यताओं जैसे कि -
  • ईश्वर की एकात्मकता
  • फरिश्ते
  • किताबें
  • पैगम्बर
  • कयामत का दिन
  • ईश्वरीय निर्णय
- में यकीन रखता है परंतु कहीं कहीं उनके विचार अलग हो जाते हैं.

अहमदी विचारधारा के अनुसार दुनिया के सभी धर्म मूलत: इस्लाम की स्थापना के लिए ही विकसित हुए थे और कार्यरत थे. कुछ इतिहासकार मानते हैं कि अहमदी प्रणेताओं ने कृष्ण को भी पैगम्बर का दर्जा दिया था. स्वयं गुलाम अहमद मानते थे कि अवतार और पैगम्बर एक ही है.

जनसंख्या:
एक अनुमान के अनुसार दुनिया में 20 करोड अहमदी मुस्लिम हैं. इनमे से सबसे अधिक अहमदी मुस्लिम पाकिस्तान में रहते हैं. इसके बाद बेनिन और भारत में सबसे बडी आबादी रहती है.

अहमदिया सम्प्रदाय का मानना है कि उनके सप्रदाय में विश्वास करने वाले लोग दुनिया के 190 देशों में रहते हैं. उनका यह भी दावा है कि उन्होने कुरान को 118 भाषाओं में अनुवादित किया है जिसमें तमिल, गुरूमुखी और हिन्दी शामिल है.

पाकिस्तान में अहमदिया:
पाकिस्तान में अहमदिया सम्प्रदाय के लोगों पर जुल्म का इतिहास लम्बा है. 6 मार्च 1953 को अहमदी लोगों और अन्य मुस्लिमों के बीच भीषण झड़पें हुई थी और मार्शल लॉ लगाना पडा था.

1984 में जनरल जिया उल हक ने एक विधेयक पास करवा कर अहमदी लोगों को अपनी पहचान मुस्लिम के रूप में करने पर प्रतिबंध लगा दिया. यदि कोई अहमदी अपनी पहचान बोल कर अथवा लिखकर मुस्लिम के रूप में करता तो उसे 3 वर्ष की कैद हो सकती थी.

आज अहमदिया मुस्लिम कम संख्या में बचे हैं परंतु वे अपने सम्प्रदाय मे गहरी आस्था रखते हैं. उनके और अन्य मुस्लिम धडों के बीच व्यापक मतभेद है. गैर अहमदी मुस्लिम मिर्ज़ा गुलाम अहमद को पैगम्बर नहीं मानते और इसलिए अहमदिया सम्प्रदाय के लोगों को भी मुस्लिम नहीं मानते.
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