भारतीय व्यापारियों के द्वारा दूसरे देशों मे जाकर वहाँ व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित करने की परम्परा नई नहीं है. काफी पुराने समय से भारतीय नागरिक व्यापार करने के उद्देश्य से दूसरे देशों मे जाते रहे हैं. दूसरे देशों मे बस रहे भारतीयों की संख्या काफी होती है इतनी भी नही कि उस शहर या देश मे रहने वाले मूल नागरिकों की संख्या से भी अधिक हो जाए. लेकिन भूतकाल में ऐसा हुआ भी है. आज की तुलना करें तो अधिकतर देशों मे भारतीय मूल के लोगों की संख्या 5 से 10% तक ही होती रही है. लेकिन कुछ वर्ष पहले एक विदेशी शहर में भारतीय प्रवासियों की संख्या मूल नागरिकों की संख्या से अधिक हो गई थी.
वह शहर म्यानमार की राजधानी रंगून था. ब्रिटिश राज ने 1885 मे म्यानमार (तब बर्मा) पर कब्जा कर उसे भारत से जोड दिया था. उसके बाद भारतीय व्यापारियों का वहाँ व्यापार के सिलसिले में जाना शुरू हुआ और धीरे धीरे वहाँ भारतीय प्रवासी व्यापारियों की जनसंख्या बढने लगी थी.
भारत से जाने वाले व्यापारी वहाँ चावल और इमारती लकडी का व्यापार करते थे. उस समय रंगून का काफी व्यापारिक महत्व हुआ करता था.
1937 में बर्मा ब्रिटिश राज से मुक्त हुआ और स्वतंत्र राष्ट्र बना. लेकिन फिर भी भारतीयों की दिलचस्पी उस देश के प्रति कम नही हुई थी. 1937 से लेकर 1940 तक के वर्षों मे बर्मा की राजधानी रंगून मे भारतीय नागरिकों की संख्या करीब 20 लाख के करीब थी, जो कि रंगून की कुल जनसंख्या का 56% थी. यानि कि मूल निवासियों की संख्या से भी अधिक.
हालाँकि उसके बाद के वर्षों मे इस संख्या मे तेजी से गिरावट आई. आज म्यानमार (पूर्व बर्मा) वामपंथी तानाशाह सैनिक शासकों द्वारा शासित एक ऐसा देश है जिसकी आर्थिक विकास दर गिर रही है. आज वहाँ रह रहे भारतीय मूल के लोगों की संख्या कम ही है.

