इसके लिए 15 वर्षों का लम्बा इंतजार करना पड़ा. इसकी पहल दैवेगोड़ा सरकार ने की थी और यह बिल विभिन्न सरकारों और समितियों और चर्चाओं - बहसों से गुजरता हुआ आखिरकार राज्यसभा में पास हो गया. राज्यसभा में दो दिनों तक चले विरोध, शोर शराबे और हंगामे के बाद मुख्य विपक्षी दल भाजपा और वामपंथी दलों के समर्थन से सरकार इस विधेयक को पास कराने में सफल रही. विधयेक के पक्ष में 186 सदस्यों ने वोट दिया जबकि विरोध में केवल एक ही मत पडा. आगे की राह:
अब इस विधेयक को राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा. राष्ट्रपति इस विधेयक को लोकसभा में विचार के लिए भेजेगी. लोकसभा में भी इस विधेयक पर मतदान होने की पूरी सम्भावना है. बहरहाल कांग्रेस, भाजपा और वाम दलों के सांसदों की संख्या को देखते हुए लोकसभा में भी यह विधेयक आसानी से पारित हो जाएगा.
इसके बाद यह विधेयक राज्य विधानसभाओं में भेजा जाएगा. इस विधेयक को कम से कम 15 विधान सभाओं से पारित किया जाना है. चुँकि भाजपा और वामदलों का समर्थन है, इसलिए यह कोई मुश्किल कार्य नहीं होगा.
इन राज्यों की विधानसभाओं में यह विधेयक आसानी से पास हो जाएगा -
कांग्रेस शासित - हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, असम
भाजपा शासित - हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, कर्णाटक, मध्य प्रदेश
एनडीए शासित - पंजाब, बिहार
वामदल शासित - त्रिपुरा, प. बंगाल, केरल
इतिहास:
महिलाओं के लिए 33% आरक्षण ही क्यों यह रोचक प्रश्न है. देश में महिलाओं की आबादी लगभग 50% की है. इसलिए उन्हें 50% आरक्षण भी मिल सकता है. अथवा 20% या 25% भी. परंतु 33% ही क्यों?
संयुक्त राष्ट्र के डिविजन फोर द एडवांसमेंट ऑफ विज़न नामक विभाग ने यह मुद्दा उठाया था. इस विभाग ने इकोनोमिक्स एंड सोशियल काउंसिल को इस बात के लिए सहमत किया कि सत्ताशील और निर्णायक मंडल को प्रभावित करने के लिए महिलाओं की कम से कम 30% भागिदारी आवश्यक है.
डीएडब्ल्यू नामक इस विभाग ने डेन्मार्क की एक महिला राजनेता की बात पर यह मुद्दा उठाया था. इस महिला राजनेता ने 70 के दशक में अमेरिका में किए गए एक अभ्यास के नतीजों के आधार पर यह बात कही थी. उस अभ्यास में कहा गया था कि यदि अल्पसंख्यकों की आबादी कम से कम 30% तक हो जाए तो उनकी आवाज़ असरकारक बन सकती है.
यदि किसी समुदाय की आबादी कुल आबादी की 30% तक हो जाए तो फिर उसकी बात सुननी ही पड़ती है और विभिन्न मुद्दों पर उस समुदाय की राह महत्वपूर्ण बन जाती है.
33% कुल संख्या का लगभग एक तिहाई होता है. इतनी संख्या में यदि कोई एक निश्चित समुदाय सत्ता में आए तो फिर उनका महत्व काफी बढ जाता है और वे अपने हित के मुद्दों को प्रबलता से उठा सकते हैं.
1995 में बिजिंग में आयोजित चौथी विश्व महिला परिषद में दुनिया भर की संसदों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू किए जाने की बात उठी थी. उसके बाद तत्कालीन एच.डी. दैवेगोड़ा सरकार ने 1996 में लोकसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का बिल पेश किया था. लेकिन उस समय विरोधी दलों ने इस बिल का जमकर विरोध किया था और यह बिल ठंडे बस्ते में चला गया था.
हाल की स्थिति:
दसवीं लोकसभा में 42 महिला सांसद थी जो सांसदों की कुल संख्या का 7.5% है. इनमें में अनुसूचित जाति की 6, अनुसूचित जनजाति की 6 और पिछड़े वर्ग की 3 सांसद थी. यह आँकड़ा दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा था. लेकिन मौजूदा लोकसभा में यह आँकड़ा उल्लेखनीय रूप से बढा.
मौजूदा15वीं लोकसभा लोकसभा में 59 महिलाएं चुन कर पहुंची है. इस तरह सदन में उनकी संख्या 10.8% हुई है. इनमें में अनुसूचित जाति की 12, अनुसूचित जनजाति की 3 और पिछड़े वर्ग की 4, अल्पसंख्यक वर्ग की 2 सांसद हैं. इस तरह से देखा जाए तो अनुसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक महिला सांसदों का कुल योग 21 हो जाता है जो कुल महिला सांसदों का 36% है.
इस तरह से कह सकते हैं कि यह विधेयक जब कानून बन जाएगा तब इस वर्ग में आने वाली महिलाओं के साथ अन्याय होने की सम्भावना नहिवत है.
विरोध की वजह:
कई राजनितिक पार्टियाँ और सांसद इस विधेयक का पूरजोर विरोध कर रहे हैं. इस विधेयक के कानून बनने के साथ 33% पुरुष सांसदों को बाहर का दरवाजा दिखा दिया जाएगा. लोकसभा में तब 181 पुरुष चेहरे दिखेंगे. 122 पुरूष सांसदों को अपनी सीटें गँवानी पड़ेगी.
बड़ी पार्टियों जैसे कि कांग्रेस, भाजपा आदि को इस विधेयक के कानून बनने से कोई खास नुकसान नहीं होगा क्योंकि उनके सांसदों की संख्या काफी अधिक है, और वे व्यापक स्तर पर चुनाव लड़ते हैं और इस तरह से उनके लिए महिला उम्मीदवारों की तलाश करना मुश्किल नहीं है. परंतु जो छोटे दल हैं तथा जिनके 2-3 सांसद ही चुनकर आते हैं उनके लिए यह खतरे की घंटी है.
विरोधी दल 33% महिला आरक्षण को रोकने के लिए इसमें पिछड़े और मुस्लिम समुदायों के लिए अलग से आरक्षण व्यवस्था करने की मांग कर रहे हैं. परंतु यह सम्भव नहीं है और उचित भी नहीं है. धर्म के आधार पर आरक्षण संविधान-विरोधी है.
भारत और महिला प्रतिनिधित्व:
भारत सर्वोच्च सदन में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या के मामले में अन्य देशों से उन्नीस ही साबित हुआ है. महिला सांसदों की संख्या के हिसाब से भारत का स्थान विश्व में 99वाँ है.
हालत यह है कि हम पाकिस्तान (49) और बांग्लादेश (67) से भी पीछे हैं.

