गांधीजी ने यह मार्ग दिखाया था. भूख हड़ताल करो और सरकार को झुकाओ. तेलंगाना राष्ट्र समिति के चन्द्रशेखर राव गांधीजी के आदर्शों को कितना मानते हैं यह तो वे ही जानें लेकिन उनकी भूख हड़ताल ने पृथक तेलंगाना के स्वप्न को साकार कर दिया है. ऐसा नहीं है कि अलग तेलंगाना राज्य अब जल्द ही एक वास्तविकता होगा, लेकिन इस दिशा में सकारात्मक प्रयास जरूर शुरू हो जाएंगे.
इतिहास:
- 1955 में राज्यों के पुनर्गठन के दौरान स्टेट रीओर्गेनाइज़ेशन कमीशन के प्रमुख फज़ल अली ने तेलंगाना को आंध्र प्रदेश का हिस्सा बनाए जाने का विरोध किया था.
- 1956: केन्द्र सरकार ने तेलंगाना को आंध्र प्रदेश का हिस्सा बनाया. लेकिन साथ ही एक जेंटलमैन एग्रीमेंट भी किया. इस समझौते के तहत इस क्षैत्र के किसी प्रतिनिधि के नैतृत्व में प्रदेश के हितों की रक्षा किए जाने का प्रावधान था. साथ ही साथ तेलंगाना के मध्य में स्थित हैदराबाद को राजधानी बनाया गया.
- 1969: जेंटलमैन एग्रीमेंट की समाप्ति का भारी विरोध शुरू हुआ. ओस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने जमकर प्रदर्शन किया जिसने हिंसक रूप धारण कर लिया. 350 छात्र मारे गए.
- 1998-99: भाजपा ने वादा किया कि यदि दिल्ली में उसकी सरकार बनी तो अलग तेलंगाना राज्य का निर्माण किया जाएगा. लेकिन तेलुगु देशम पार्टी के विरोध की वजह से वह ऐसा नहीं कर पाई. तेदप भाजपा की सहयोगी पार्टी थी.
- 2001: के. चन्द्रशेखर राव ने तेदपा से त्यागपत्र दे दिया था. उन्होने 2001 में तेलंगाना राष्ट्र समिति की रचना की.
- 2004: कांग्रेस ने टीआरएस के साथ सीटों का समझौता किया और बदले में पृथक तेलंगाना का वादा भी. लेकिन सत्ता में आने के बाद वह अपने वादे से मुकर गई.
- 2009: चुनावों के समय कांग्रेस और भाजपा ने एक बार फिर तेलंगाना का मुद्दा उछाला. टीआरएस की बुरी तरह हार हुई.
- 29 नवम्बर 2009: केसीआर ने तेलंगाना के मुद्दे को लेकर भूख हड़ताल शुरू की.
- दिसम्बर 9, 2009: केन्द्र ने तेलंगाना के निर्माण को सैद्धांतिक मंजूरी दी.
प्रक्रिया:
अलग तेलंगाना राज्य को सैद्धांतिक मंजूरी मिल जाने के बाद भी इसका क्रियांवयन इतना सरल भी नहीं है. सविंधान की तीसरी धारा केन्द्र को यह अधिकार देती है कि वह किसी राज्य के किसी हिस्से को लेकर अथवा दो राज्यों के हिस्सों को मिलाकर एक नया राज्य बना सकती है.
सँविधान विशेषज्ञों की राय इस मसले पर अलग अलग है, लेकिन अधिकतर विशेषज्ञ मानते हैं कि केन्द्र चाहे तो अलग राज्य बना सकता है. इसके लिए राष्ट्रपति संसद को धारा 3 का हवाला देकर नया राज्य बनाए जाने का सुझाव दे सकती है. इसके बाद संसद उस राज्य के लिए एक रीओर्गेनाजेशन बिल बनाकर उसे उस राज्य की विधानसभा को भेजती है.
राज्य विधानसभा उस पर विचार करती है और यदि कोई सुझाव हो तो उसे शामिल करती है. यह सबकुछ राष्ट्रपति द्वारा तय समयसीमा के अंदर होता है. विधानसभा द्वारा भेजे गए ड्राफ्ट को संसद साधारण बहुमत से पारित कर देती है. यह जरूरी नहीं कि विधानसभा के सुझाव माने ही जाएँ. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी प्रक्रिया कुछ इस तरह से होगी – पहले राज्य विधानसभा पृथक राज्य के निर्माण से संबंधित एक प्रस्ताव पारित कर उसे संसद को भेजेगी. केन्द्र उस प्रस्ताव को कैबिनेट के समक्ष रखेगा. कैबिनेट द्वारा मान्य होने के बाद उसे संसद में लाया जाएगा जहाँ सविंधान संशोधन का प्रस्ताव पारित किया जाएगा जिससे कि नया राज्य बन सके.
यह जटील प्रक्रिया है और इसमें महिनों लग जाते हैं. इसके अलावा नए राज्य का सीमांकन करने, इमारते बनाने, दस्तावेज बाँटने आदि कार्यों में भी समय लगता है.
नई मांगें:
पृथक तेलंगाना के बाद अब देश में अन्य राज्यों के लिए भी मांगे उठनी तेज होगी. इनमें से कुछ मांगे इस प्रकार हैं:
- आंध्र प्रदेश : रायलसीमा
- तमिल नाडु : कोंगु नाडु
- कर्णाटक : कूर्ग
- महाराष्ट्र : विदर्भ, मराठवाड़ा, कोंकण
- गुजरात: सौराष्ट्र
- राजस्थान : मेवाड़, मरूप्रदेश
- मध्य प्रदेश : मालवा
- उत्तर प्रदेश : हरित प्रदेश, अवध, पूर्वांचल
- मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश: बुंदेलखंड
- प. बंगाल : गोरखालैंड
- असम: बोडोलैंड
- ओडिसा: कलिंग, उत्कल
समस्याएँ:
तेलंगाना को लेकर गतिरोध समाप्त नहीं हुआ है बल्कि बढ गया है. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि कांग्रेस ने एक बड़ी भूल कर दी है. कांग्रेस ने समय खरीदने के लिए तेलंगाना को मंजूरी दी लेकिन इससे आंदोलन कम नहीं और तेज हो गया.
अब आंध्रप्रदेश के विधायक और सांसद इस्तीफे देने पर उतारू हैं, क्योंकि सभी के हित इससे जुड़े हुए हैं. राज्य की शक्तिशाली “खान” लॉबी किसी भी कीमत पर अलग राज्य बनने नहीं देगी और दूसरा मुद्दा हैदराबाद का भी है.
हैदराबाद सही मायनों में आंध्र का सबसे विकसित क्षैत्र है और इसे कोई छोड़ना नहीं चाहेगा. तेलंगाना इस लिहाज से फायदे में कि हैदराबाद तेलंगाना क्षैत्र के मध्य में आता है. इसलिए स्वाभाविक तौर पर वह तेलंगाना के साथ जाएगा. लेकिन बाकि का आंध्रप्रदेश हैदराबाद को छोड़ने की गलती नहीं कर सकता. तो क्या हैदराबाद अगला चंडीगढ होगा?
हैदराबाद और आसपास की 40% आबादी मुस्लिम है और इसलिए वोटबैंक की राजनीति भी अपना खेल खेलेगी.

