Sunday, Feb 12th

अंतिम अपडेट:04:05:04 AM IST

पतीत पावन गंगाधाम - ऋषीकेश

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rishikesh14

भारत विविधताओं का देश है. यहाँ प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक स्थलों की भरमार है. मुझे हमेशा से घूमने का शौक रहा है. मैंने भ्रमण के दौरान भारत के कई पर्यटन और ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया है. इन्ही पर्यटन स्थलों में से कुछ स्थलों का विवरण अपने शब्दों में देना चाहूँगी.

3. ऋषीकेश -
अब हम जा रहे है अपने इस भ्रमण के तीसरे पड़ाव की ओर ....

जैसे की आपसे मैंने पहले भी बताया था की मेरी सबसे पसंदीदा जगह है ऋषीकेश.  हरिद्वार से तकरीबन २०-२५ किलोमीटर की दूरी पर है - ऋषीकेश. रेल का एक सिरा जाता है देहरादून की ओर पहाड़ों में और दूसरा ऋषीकेश की ओर ...

लेकिन हरिद्वार में हर की पौडी के किनारे से लगे शटल रिक्षा भी एक बेहतरीन ज़रिया है ऋषीकेश जाने का.

गंगा नदी का साथ कुछ पलों के लिए ज़रूर रहता है. और आगे चलकर आती है गंगा की मुख्य धारा जहाँ से उसका रूख हरिद्वार की ओर होता है. इस जगह से समयानुसार उसकी गति को संतुलित करने की ओर कभी जरूरत पड़ने पर प्रवाह को साफ सफाई के लिए बंद करने की भी व्यवस्था है. आगे चलकर मन्दिर एवं आश्रमों की कतारों को भी आप देख सकते हैं.

आगे जाने पर बांयी ओर शान्तिकुञ्ज -माता गायत्री का धाम है. यहाँ भक्त जन साधना करने आते है जिनके रुकने की सुचारू व्यवस्था है.

अगर आप रिक्शा में सवार है तो दायें बांये देखने का सिलसिला जारी रखिये क्योंकि यही से शुरू हो रहा है पर्वताधिराज हिमालय का साम्राज्य. बहुत ही हलके से वह अपने पंख पसारना शुरू करते है.

अगर पैकेज टूर में आए लोगों से आप पूछेंगे की ऋषीकेश में आप कँहा घूमने गए? तो ज्यादातर जवाब होंगे -लक्ष्मण झुला , रामझुला, गीता भवन आदि.... पर यह सब जगह ऋषीकेश से थोड़ी सी दूरी पर है और उस जगह का एक खास नाम है "मुनि की रेती ".

तो अब हम आ गए है ऋषीकेश में. अगर आप दौड़ती हुई शहरी जिंदगी से थकान महसूस कर रहे हो तो यह जगह आराम का अच्छा पर्याय बन सकती है. यहाँ यात्रिओं की धूम नहीं मचती , क्योंकि यात्री यहाँ कुछ घंटे के लिए ही आते है और फिर हरिद्वार या बदरीनाथ के लिए चल पड़ते है.
यहाँ हम माया कुण्ड नामक जगह पर एक हनुमानजी के मन्दिर में ठहरे थे. यहाँ एक छोटा सा कमरा मिलता है. मन्दिर के नीति नियमों का पालन श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए. सुबह और शाम भव्य आरती होती है. यह मन को शांति देने वाली सुंदर जगह है. यहाँ से सिर्फ़ पाँच मिनट की दूरी पर पतित पावनी गंगाजी की धारा है. एक पक्के बंधे हुए विशाल घाट पर सीढियाँ चढ़कर जब ऊपर आते है तो दर्शन होते है गंगामैया के ... इस जगह का नाम है त्रिवेणी घाट. एक छोर पर है शिवजी की जटासे निकलती गंगा की मनोहर प्रतिमा और मध्य में है अर्जुन को गीता ज्ञान देते हुए श्री कृष्ण की मनोहारी विशाल मूर्ति और एक विशाल गंगा माता का मन्दिर. घाट पर चलते हुए दूसरी और की सीढ़ियां उतरते है तो आ जाती गंगा नदी. यहाँ आपको गंगा का प्राकृतिक रूप देखने को मिलेगा. उसके शीतल जल में पाँव रखते ही मन प्रसन्न हो जाता है. यहाँ पर ऋतू अनुसार शाम सात से साढे सात के बीच गंगा माता की भव्य आरती होती है. प्रवाह में दीप बहाए जाते है. काफी भीड़ रहती है पर विशाल किनारे पर सब शान्ति से देख सकते है. लगभग सात बड़े बड़े आरती के पित्तल के दिए से निकलती हुई परम ज्योत की तो आप कल्पना कर के देखिये ....

यहाँ से बांये हाथ पर ही पहाड़ों की शृंखला शुरू हो जाती है. सुबह साढ़े सात का वक्त आरती के लिए होता है. यहाँ स्नान करने की महिमा और आनंद ही कुछ ओर है. यहाँ का स्नान तेज प्रवाह और जंजीरों से जकडा हुआ नहीं है. पास में ही साफ सुथरे बाथ रूमों मे कपडे बदलने की व्यवस्था है.

शाम के वक्त आरती में यहाँ कई विदेशी लोगों को भी शामिल होते हुए देखा जा सकता है. यहाँ मेरी मुलाक़ात दो विदेशी महिलाओं से हुई जो अमेरिका से आई थी. काफी कुछ बातें हुई. वे भारत से काफी प्रभावित थी.

ऋषीकेश मे एक देखने लायक जगह है भरत मन्दिर. शांत ,सुंदर और सुरम्य है जो कोई राजा भरत की याद में बांधा गया है.  एक ओर अय्यपा मन्दिर है जो बहुत सुंदर है. पूरे ऋषीकेश में हमें कॉफी  पीने के लिए नही मिली आखिरकार ढूँढते हुए यहाँ तक आना पड़ा था.

अगर फुर्सत हो तो ऐसी जगह पर हमें तीन चार दिन ठहरना चाहिए. यहाँ टहलते हुए सिर्फ़ चलकर ही घूमने का मज़ा ही कुछ और है. हम यूँ ही टहलते हुए रेलवे स्टेशन के अंदर तक घूमने निकल पड़ते थे. एक अनजानी जगह पर जहाँ हमें कोई पहचानता न हो वहाँ बेफिक्र होकर घूमना एक अनोखा अनुभव है. बाज़ार में सभी चीज वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती है. हिमालय में बसे हुए विभिन्न स्थानों के लिए बस भी यंही से चलती है.

मैं चाहूंगी की आप भी ऋषीकेश में कभी मेरी तरह गंगा नदी को सही मायने मॆं महसूस करें. साफ गंगा [थोड़ी सी गंदगी हैं जो माफी के लायक है ], प्राकृतिक गंगा, तेज गंगा, शीतल गंगा जहाँ हम हर सुबह और शाम तकरीबन दो दो घंटे उसे निहारते हुए बैठे रहते थे ......

तो अब अगली बार हम मिलेंगे मुनि की रेती पर ....
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