भारत विविधताओं का देश है. यहाँ प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक स्थलों की भरमार है. मुझे हमेशा से घूमने का शौक रहा है. मैंने भ्रमण के दौरान भारत के कई पर्यटन और ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया है. इन्ही पर्यटन स्थलों में से कुछ स्थलों का विवरण अपने शब्दों में देना चाहूँगी.
१.हरिद्वार -
किसी भी आस्था वान यात्री के लिए उत्तरांचल का यह सुंदर स्थल है - हरिद्वार. हरिद्वार यानि हरि का द्वार. पवित्र गंगा यहाँ से ही हिमालय पिता की गोद छोड़कर मैदान में प्रवेश करती है. उसका निश्चल बहता जल हमारे मन में श्रद्धा के दीप जलाता है. हरकी पौडी का पावन घाट और उसकी संध्या आरती जो मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकते है, यह सिर्फ़ एहसास का विषय है. उसके किनारे बसे हुए कतार बंध मंदिरों की शोभा भी अवर्णनीय है. कनखल और शांतिकुंज के गायत्री धाम को भी अवश्य देखना चाहिए.
हम तीन बार यहाँ आ चुके है. हरिद्वार की गलियों में पैदल घूमने का लुत्फ़ ही कुछ और है. बाज़ार की लुभावनी कतार बंध दुकानों और प्रवासियों की चहल पहल देखते ही बनती है. रोपवे वाले चंडी देवी और मनसा देवी के मन्दिर भी सुंदर है. हम गंगा के घाट पर तीन घंटे उसके प्रवाह के सुंदरता निहारते हुए बैठे रहे थे. पानी में पैर रखकर उसकी तेज धारा को देखते रहना एक सुंदर अनुभव है. मेरी और मेरे पति की एक आदत है कि हम भ्रमण के दौरान जल्दबाजी नही करते हैं. हर जगह का पूर्ण आनंद उठाते है. उस जगह के विशेष पकवान का भी रसास्वाद करते है. यहाँ के गोलगप्पे और चाट खाने का मज़ा ही कुछ और है.
लेकिन हमारे देश के श्रद्धालुओं की एक बात हमें कतई पसंद नहीं आती. गन्दगी फैलाने मे हम जाने क्यों सबसे आगे रहते हैं. हर जगह गंदगी का जैसे साम्राज्य फैला रखा होता है. गंगा हमें पवित्र करती है लेकिन हम तो उसे गन्दा ही करते है. क्या हम अपने को सुधार पाएंगे ?
उत्तरांचल प्रवास की यह शुरुआत है.
अगली बार एक और नई जगह की बात आपके साथ ...
हम तीन बार यहाँ आ चुके है. हरिद्वार की गलियों में पैदल घूमने का लुत्फ़ ही कुछ और है. बाज़ार की लुभावनी कतार बंध दुकानों और प्रवासियों की चहल पहल देखते ही बनती है. रोपवे वाले चंडी देवी और मनसा देवी के मन्दिर भी सुंदर है. हम गंगा के घाट पर तीन घंटे उसके प्रवाह के सुंदरता निहारते हुए बैठे रहे थे. पानी में पैर रखकर उसकी तेज धारा को देखते रहना एक सुंदर अनुभव है. मेरी और मेरे पति की एक आदत है कि हम भ्रमण के दौरान जल्दबाजी नही करते हैं. हर जगह का पूर्ण आनंद उठाते है. उस जगह के विशेष पकवान का भी रसास्वाद करते है. यहाँ के गोलगप्पे और चाट खाने का मज़ा ही कुछ और है.
लेकिन हमारे देश के श्रद्धालुओं की एक बात हमें कतई पसंद नहीं आती. गन्दगी फैलाने मे हम जाने क्यों सबसे आगे रहते हैं. हर जगह गंदगी का जैसे साम्राज्य फैला रखा होता है. गंगा हमें पवित्र करती है लेकिन हम तो उसे गन्दा ही करते है. क्या हम अपने को सुधार पाएंगे ?
उत्तरांचल प्रवास की यह शुरुआत है.
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