ये बदलते भारत की तस्वीर है कि राजस्थान के सीमावर्ती जैसलमेर ज़िले के एक गाँव देवड़ा के राजपूत परिवारों में कोई 120 साल में दूसरी बार बारात आई.
ये बदलते भारत की तस्वीर है कि राजस्थान के सीमावर्ती जैसलमेर ज़िले के एक गाँव देवड़ा के राजपूत परिवारों में कोई 120 साल में दूसरी बार बारात आई.इन बरसों में कोई बारात इसलिए नहीं आई क्योंकि इन राजपूत परिवारों में ब्याहने के लिए बेटियाँ ही नहीं थीं.
देवड़ा की शगुन जब मंगलवार की शाम विवाह सूत्र में बंधी तो उसके पिता पन्ने सिंह अभिभूत थे.
इससे पहले 1998 में देवड़ा में सौ सालों बाद पहली बारात आई थी.
थार रेगिस्तान के इस भू-भाग में कुछ जातियों में लड़कियों की संख्या बहुत कम रही है.
देवड़ा गाँव ने सात मई, 1998 को पूरी दुनिया का ध्यान खींचा जब गाँव की लाडली जयंत कँवर का विवाह हुआ क्योंकि पिछले सौ सालों में राजपूत परिवारों में ये पहला मौक़ा था जब कोई बारात आई.
जयंत कँवर के पिता इंदर सिंह उन अभिवावकों में से हैं जो बेटा-बेटी में कोई फ़र्क नहीं करते. इसीलिए जब जयंत विवाह सूत्र में बंधी तो वो बदलते हुए भारत की तरफ़ एक क़दम था.
जयंत कँवर का विवाह हुआ तो बारात गाँव में आई थी लेकिन मंगलवार को जब जयंत की चचेरी बहन शगुन का विवाह हुआ तो बारात गाँव की जगह जैसलमेर शहर आई.
परिजनों को लगा कि गाँव के मुक़ाबले शहर में सुविधाएँ ज़्यादा हैं. लिहाजा शादी की रस्म और उत्सव जैसलमेर में संपन हुए.
अपनी लाडली के हाथ पीले करके अभिभूत पन्ने सिंह कहते हैं कि उनके यहाँ बेटा हो या बेटी इसमें कोई अंतर नहीं है.
विवाह की धूमधाम के बीच जैसलमेर से पन्ने सिंह ने फ़ोन पर बीबीसी से कहा,''मेरे लिए इससे बड़ा ख़ुशी का क्या मौक़ा होगा कि मेरी लाडली बेटी का धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ है."
बदलाव
जैसलमेर से 70 किलोमीटर दूर देवड़ा में कभी राजपूत परिवारों में कोई बेटी नहीं थी.
अब ऐसा बदलाव आया है कि इन परिवारों में कोई एक दर्जन से ज्यादा लडकियाँ हैं. अभिवावक अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखा रहे हैं.
कभी राखी के त्यौहार पर भाई की कलाई प्रेम के धागे के लिए तरस जाती थीं क्योंकि गाँव के इन राजपूत परिवारों में बेटियाँ ही नहीं थीं.
अब वो बीती बात है.
जैसलमेर की इतिहासकार नंदकिशोर कहते हैं, "इस इलाक़े में शासक जातियों में बेटियों की परवरिश करने की परंपरा नहीं थी क्योंकि ये इलाक़ा अक्सर आक्रमण झेलता रहता था. इसकी वजह से शासक जातियों में अपनी बेटियों की चिंता रहती थी. इस चिंता ने बेटियों को न पालने की प्रवृत्ति को जन्म दिया."
जैसलमेर उन ज़िलों में शामिल है जहाँ महिलाओ की तादाद मर्दों की तुलना में बहुत कम है.
वहां प्रति एक हज़ार पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओ की संख्या मात्र 821 है.