रावलपिंडी में पाकिस्तान के सेना मुख्यालय के पास के एक सिनेमाघर में इन दिनों भारतीय फ़िल्में दिखाई जा रही हैं.‘सिनेपेक्स’ नाम के इस मल्टीप्लैक्स में चार फ़िल्में ‘रावण’, ‘राजनीति’, ‘हाऊस फ़ुल’ और ‘काइट्स’ का एक साथ प्रदर्शन हो रहा है.
पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के सत्ता संभालने के बाद औपचारिक रुप से भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन की अनुमित दे दी गई है.
पाकिस्तान के छोटे-बड़े हर शहर में अब नई फिल्में दिखाई जा रही हैं जिससे पाकिस्तान के सिनेमा उद्योग को काफ़ी लाभ हो रहा है.
रविवार को जब रावलपिंडी में चकलाला कैंटोन्मेंट के परिसर में स्थित ‘सिनेपेक्स’ में मुझे फ़िल्म ‘राजनीति’ देखने का अवसर मिला तो यह मेरे लिए बहुत ही सुखद अनुभव था.
अगर आप भारत से जुड़े हों, आपकी नज़र में भारत एक मित्र देश हो और हिंदी भाषा आपकी रोज़ी-रोटी का साधन हो तो पाकिस्तानी सेना के इलाक़े में भारतीय फ़िल्म देखना सचमुच यादगार अनुभव है.
पाकिस्तान के राष्ट्रगान के बाद जब फ़िल्म शुरु हुई तो पाकिस्तान के सैंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सैंसर्स पर पहली बार मैंने किसी भारतीय फ़िल्म का नाम देखा और यह सत्ता में बैठे लोगों के रवैये में परिवर्तन को दर्शाता है.
मनोरंजन चैनलों पर प्रतिबंध
पाकिस्तान के सिनेमाघरों में भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन पर पहले से ही प्रतिबंध था और जनरल मुशर्रफ़ के कार्यकाल में तो भारतीय मनोरंजन चैनल्स पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया.
सरकार ने तब ये तर्क दिया था कि भारतीय फ़िल्में और ड्रामे पाकिस्तान की संस्कृति को भ्रष्ट कर रही हैं. जैसे ही प्रतिबंध लगा उन चैनलों और फ़िल्मों को देखने की मांग और बढ़ गई.
फ़िल्मों पर से तो प्रतिबंध हट गया है लेकिन मनोरंजन चैनलों पर प्रतिबंध जारी है. इस प्रतिबंध के बावजूद लाखों लोग रोज़ाना इन चैनलों को देखते हैं और भारतीय ड्रामों ने तो ऐसा असर किया है कि पाकिस्तान के कुछ मनोरंजन चैनल भारतीय ड्रामे दिखाते हैं.
सिनेमाघर फिर हुए मालामाल
वर्तमान सरकार ने भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन पर लगी रोक को हटा कर देश के सिनेमाघर को नई जान दी है. जब भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध था और पाकिस्तान की भी फ़िल्में नहीं बन रही थीं तो कई सिनेमाघर इस्लामी मदरसे बन गए थे.
‘सिनेपेक्स’ का एक हॉल फ़िल्म ‘राजनीति’ देखने आए लोगों से खचाखच भरा हुआ था और इनमें से अधिकतर फ़िल्म प्रेमी पाकिस्तानी सेना के थे जो अपने परिवार के साथ आए थे.
मैंने पहली बार पाकिस्तानी फ़ौजियों को एक भारतीय फ़िल्म का आनंद लेते हुए देखा और जब इंटरवल हुआ तो कुछ लोग भारतीय कॉंग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी के परिवार पर तीखी टिप्पणियां करने लगे.
भारतीय फ़िल्मों ने जिस तरह पाकिस्तान में अपनी जगह बनाई है उसका उदाहरण कहीं और नहीं मिलता. प्रतिबंध के बावजूद भारतीय मनोरंजन चैनल आज पाकिस्तान के हर घर की ज़रूरत है और जो केबल टीवी वाला इन चैनल्स को नहीं दिखाता उसे ग्राहक भी नहीं मिलते.
हो सकता है ये फ़िल्में ही भारत और पाकिस्तान के लोगों के एक दूसरे के प्रति पूर्वाग्रहों को मिटा दें.