Sunday, Feb 12th

अंतिम अपडेट:04:05:04 AM IST

एक भूल ने निगले सात साल

BBC Hindi
100901132435_abdul_karim283पीएम तिवारी  27 वर्षीय अब्दुल करीम ने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें एक मामूली सी भूल या ग़लती की सज़ा अपने जीवन के सात साल देकर चुकानी पड़ सकती है.

पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर ज़िले के निवासी अब्दुल करीम पाकिस्तान की रावलिपिंडी जेल में सात साल बिता कर कोलकाता होते हुए बुधवार को अपने घर लौटे हैं.

सात वर्ष पहले पंजाब के सीमावर्ती इलाक़े में दोस्तों के साथ खेलते समय फुटबाल कंटीले तारों की बाड़ को पार कर सीमा के दूसरी ओर चली गई थी और अब्दुल करीम की ग़लती बस यही थी कि वो उस गेंद को लाने के लिए गए तो पाकिस्तानी रेंजरों की नज़र में आ गए और उनके हत्थे चढ़ गए.

तब से सात साल उन्होंने पाकिस्तान की जेल में काटे हैं. अब्दुल करीम ने तो ये उम्मीद भी छोड़ दी थी कि अब कभी वो अपने वतन भारत लौट कर परिजनों से दोबारा मिल सकेंगे.

मुंबई में नवंबर 2008 को हुए चरमपंथी हमलों के बाद अब्दुल करीम पाकिस्तान की जेलों से छूटने वाले पहले भारतीय नागरिक हैं.

अब्दुल करीम बताते हैं कि वो पहले अपने गांव के एक मदरसे में पढ़ाते थे. बाद में ऊंची तालीम हासिल करने के लिए वह पहले दिल्ली और फिर पंजाब चले गए थे.

वहाँ पटियाला में सीमा पर दोस्तों के साथ फुटबाल खेलते समय ही वो घटना हुई जिसने ज़िंदगी के सात साल उनसे छीन लिए.

अब्दुल करीम के परिजनों को पहले पांच साल तक तो उनकी कोई ख़बर ही नहीं मिली. जो दोस्त उस समय उनके साथ फुटबाल खेल रहे थे उन्होंने ने भी अब्दुल करीम के परिजनों को उनके पाकिस्तानी रेंजरों के हाथों गिरफ्तार होने की कोई सूचना नहीं दी थी.

वर्ष 2007 में अंतरराष्ट्रीय रेडक्रास सोसायटी की एक टीम ने अब्दुल करीम का पता लगाया था. उसके बाद भारत सरकार ने पाकिस्तानी अधिकारियों के समक्ष उनकी रिहाई का मुद्दा उठाया.

एक स्थानीय ग़ैर-सरकारी संगठन दिगंत वेलफेयर सोसायटी ने भी इस मामले में अब्दुल करीम के परिजनों की काफ़ी मदद की. रेडक्रास के ज़रिए ही अब्दुल करीम ने दो साल पहले अपने परिजनों को पत्र भेज कर अपने जीवित होने की सूचना दी थी.

तब तक परिजन अब्दुल करीम को मृत मान चुके थे. उसके बाद दो साल तक चले क़ानूनी दाँव-पेंचों के बाद आख़िरकार सात साल बाद अब्दुल करीम ने वाघा सीमा पार कर अपने देश में क़दम रखा.

अमृतसर से पंजाब मेल से वो मंगलवार की शाम को हावड़ा पहुंचे. अब्दुल करीम का कहना है कि पाकिस्तान से अपने देश में लौटना एक बेहद सुखद अनुभव है. यह ईद के मौक़े पर अल्लाह का तोहफ़ा है.

अल्लाह का तोहफ़ा

पाकिस्तानी जेल में अपने अनुभवों को याद करते हुए वो कहते हैं, "वहां सात साल बेहद तकलीफ़ में गुजरे. जेल में सिर्फ़ दो वक़्त ही खाना मिलता था. वह भी आधा पेट. फटे हुए कपड़ों में ही मुझे कई साल गुज़ारने पड़े. जेल में काम नहीं करने पर काफ़ी पिटाई होती थी."

अब्दुल करीम कहते हैं, "गिरफ्तारी के बाद पहले नौ महीनों तक उनसे अलग-अलग जगहों पर गहन पूछताछ की गई थी. इस दौरान शारीरिक अत्याचार भी किए गए, पाकिस्तानी अधिकारी मेरी ये बात मानने को तैयार ही नहीं थे कि फुटबाल लाने के लिए ग़लती से सीमा के उस पार आ गए थे."

अब्दुल करीम का कहना है कि रावलपिंडी जेल में अभी सात और भारतीय बेहद अमानवीय परिस्थितियों में दिन काट रहे हैं.

इस मामले को प्रमुखता से उठाने वाले कोलकाता के संगठन के प्रमुख उत्पल राय बताते हैं कि दो साल पहले अब्दुल करीम के मामले की जानकारी मिलने पर संगठन ने भारतीय विदेश मंत्रालय और पाकिस्तान के उच्चायुक्त के समक्ष इसे उठाया था. दो साल तक चली जटिल क़ानूनी प्रक्रिया के बाद पाकिस्तान ने रिहा करने का भरोसा दिया था. लेकिन उन्हें 29 अगस्त को रिहा किया गया.

बुधवार सुबह अब्दुल करीम जब अपने गांव पहुंचे तो गांव वालों की रमज़ान की खुशियां मानो दोगुनी हो गईं. पूरा गाँव ही अब्दुल करीम की अगवानी के लिए उमड़ पड़ा.
BBC Hindi
BLOG COMMENTS POWERED BY DISQUS