Monday, May 21st

अंतिम अपडेट:04:05:04 AM IST

उत्साह के साथ आशंकाएँ भी

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090913131009_indian_economy466आम तौर पर लोग 'नया साल बेहतर हो' की शुभकामनाएँ देते हैं लेकिन इस बार ये महज अनुमान नहीं है बल्कि बेहतरी की शुरुआत हो चुकी है, कम से कम आर्थिक क्षेत्र में.

पूरी दुनिया वर्ष 2008 के आर्थिक संकट से सकते में थी लेकिन आर्थिक पटल पर छाया ग्रहण वर्ष 2009 में छँटने लगा और साल के ख़त्म होते-होते हर तरफ़ के आँकड़े उत्साहित करने वाले हैं.

हाँ दुबई वर्ल्ड के कर्ज़ संकट ने साल के आख़िरी महीने में वित्त जगत को ज़रूर चिंता में डाल दिया लेकिन ये गोल्डमैन सैक्स या एआईजी या फ्रेडी माय के दिवालिएपन से उत्पन्न वैश्विक संकट जैसा नहीं था.

सब प्राइम संकट से सबसे पहले वैश्विक आर्थिक संकट का संकेत देने वाला देश था अमरीका, जिसने यूरोप और कुछ हद तक एशिया को भी संकट में डाल दिया.

लेकिन स्थितियाँ बदल चुकी है, अमरीका का जीडीपी डेढ़ फ़ीसदी की गति से बढ़ रहा है. यूरोपीय संघ और जापान ने औपचारिक तौर पर मंदी से निकलने की घोषणा कर दी है.

उत्साह के साथ आशंका

इस दशक का आख़िरी दशक यानी 2010 उत्साहों वाला साल है. लेकिन विश्लेषकों को ही नहीं बल्कि आम जनता को भी कई शंकाए हैं.

ये भारत के लिए भी लागू होती है जो वैश्विक संकट से कमतर प्रभावित रहा और अब विकास पथ पर फिर तेज रफ़्तार दौड़ रहा है.

आँकड़े इसके गवाह हैं. इस साल जनवरी से मार्च के बीच भारत की विकास दर 5.8 प्रतिशत रही. तब ये कहा जाने लगा कि नौ फ़ीसदी विकास दर इतिहास बन चुका है.

लेकिन स्थितियाँ इतनी तेज़ी से बदली कि इसकी अगली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच यह दर बढ़ कर 6.1 फ़ीसदी हो गई और सितंबर के आख़िर में 7.1 फ़ीसदी.

पर इसके पीछे बड़ा हाथ है आर्थिक संकट के दौरान दिए गए आर्थिक प्रोत्हासन पैकेज का जो हज़ारों करोड़ रूएप का है. अब बदले हालात में इसे वापस लेने की चर्चा हो रही है.

सरकारी निवेश बढ़ने से सड़क निर्माण और राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी रोज़गार योजना में तेज़ी आई. पैकेज के तहत कर कम किए जाने से कॉर्पोरेट जगत को फायदा पहुँचा .

लेकिन जब ये सुविधाएँ वापस ली जाएंगी तब क्या होगा. ये सवाल सबके जेहन में है.

भारत की चुनौतियाँ

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी कह चुके हैं कि आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज को हमेशा के लिए जारी नहीं रखा जा सकता और जनवरी में इसकी समीक्षा होगी.

विश्लेषकों के मुताबिक इसके बाद ही पता चलेगा कि बिना आर्थिक मदद के विकास दर की गति बढ़ती है या नहीं.

निजी क्षेत्र के लिए और बड़ी चुनौतियाँ खड़ी है ख़ास कर निर्यात पर आश्रित ईकाइयों के लिए. भारत का निर्यात वर्ष 2009 में अक्तूबर तक लगातार गिरता रहा.

हालाँकि नवंबर में हालात सुधरी और निर्यात वृद्धि दर सकारात्मक हो गया.

विकास की आड़ में एक चुनौती कृषि क्षेत्र से भी है. इस क्षेत्र में तीन फ़ीसदी विकास दर पीछे काफी पीछे छूट गई है.

इस साल तो हालत और ख़राब रही क्योंकि मॉनसून ने दगा दे दिया और खाद्यान्न उत्पादन एक करोड़ दस लाख टन घटने की आशंका है.

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