जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह का कहना है कि पिछले साल घाटी में बने हिंसा के माहौल के लिए कोई बाहरी ताक़त ज़िम्मेदार नहीं थी बल्कि ये लोगों के अंदर लंबे वक़्त से पनप रहे ग़ुस्से का नतीजा थी.
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह का कहना है कि पिछले साल घाटी में बने हिंसा के माहौल के लिए कोई बाहरी ताक़त ज़िम्मेदार नहीं थी बल्कि ये लोगों के अंदर लंबे वक़्त से पनप रहे ग़ुस्से का नतीजा थी.वो ये ज़रूर मानते हैं कि पड़ोसी मुल्क ने इसका फा़यदा उठाने की पूरी कोशिश की.
उनके मुताबिक़ पाकिस्तान मामले को इसीलिए भी बढ़ते देखना चाहता था ताकि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की यात्रा के दौरान भारत की बुरी छवि पेश हो.
उमर अब्दुल्लाह ने बीबीसी की जम्मू संवाददाता बीनू जोशी के साथ एक विशेष बातचीत में ये भी कहा है कि सेना के विशेषाधिकार को लेकर एक समिति का गठन किया गया है जो बातचीत के बाद उन्हें एक रिपोर्ट सौंपेगी.
उमर अब्दुल्लाह के हुई लंबी बातचीत के प्रमुश अंश:
सवाल: पिछला वर्ष जम्मू-कश्मीर के लिए बड़ा उथल-पूथल भरा था क्या आप ने आकलन किया है कि पिछले वर्ष वादी में जिस तरह हालात ख़राब हुए थे उसके लिए कौन ज़िम्मेदार था? क्या आपने या प्रशासन ने कोई ऐसा क़दम उठाया था जिसका असर इस तरह हुआ?
जवाब: अगर आप देखें तो ये सिलसिला तीन साल से लगातार जारी है.
पहले साल ये अमरनाथ स्थापना बोर्ड की ज़मीन पर हुआ. ज़मीन देने का असर कश्मीर में हुआ और वापिस लेने का जम्मू में हुआ. वो हालात बहुत मुश्किल से ठीक किए गए. फिर वर्ष 2009 में शोंपियां हादसे के बाद लोगों में एक ऩाराज़गी थी उससे कुछ अशांति पैदा हुई.
पिछले साल सरकार की तरफ़ से कोई ऐसा फैसला नहीं लिया गया था, कोई ऐसा क़दम नहीं उठाया गया था जिससे इस तरह की प्रतिक्रिया हो. लेकिन लोगों के अंदर नाराज़गी के भाव पैदा होने शुरू हो गए थे. जब तीन लोगों को मार कर उन्हें 'आतंकवादियों' के तौर पर पेश किया गया. उसके बाद सैयद अली शाह गिलानी ने प्रदर्शन का कार्यक्रम शुरू कर दिया.
प्रदर्शन के दौरान आंसू गैस छोडे़ जाने के दौरान गोले से एक नौजवान मारा गया जिससे मामला और बिगड़ गया.
जब हालात बिगड़ना शुरू हो गए तो फिर सब गाड़ी में चढ़ गए ... जो मुझे पसंद नहीं करते थे, जो चाहते थे यहाँ हकुमत बदले या राज्यपाल शासन आए या चुनाव दुबारा हों; वो सब इस गाड़ी में कूद पड़े. अलगाववादी संगठन, छोटे-मोटे लीडर जिन्हें कोई जानता भी नहीं था.
लोगों में एक नाराज़गी पहले से ही मौजूद थी वो बढ़ती गई जैसे-जैसे हादसे होते गए, बदकिस्मती से नौजवानों की मौत होती रही. लोग ज़ख़्मी होते रहे. लोगों का ग़ुस्सा बढता गया. लेकिन मैं नहीं मानता कि इसके पीछे कोई बहुत बड़ी साजि़श है या कोई बड़ा हाथ है.
अब स्पष्ट आदेश दिए गए हैं कि कोई भी इस तरह का कदम न उठाया जाए, कोई ऐसी घटना न घटे जिससे इनको बहाना मिले दुबारा प्रदर्शन करने का.
लेकिन सुरक्षा बल तो इशारों में कह रहे हैं कि पत्थर मारनेवालों को पाकिस्तान की तरफ से बढ़ावा मिल रहा था?
देखिए मैं इशारों को नहीं मानता. मुझे ठोस सबूत चाहिए.
जैसा कि मैंने कहा कि जब गाड़ी चलनी शुरु हुई तो सब उसमें कूद गए. हमारे पड़ोसी को भी मौक़ा मिला.
राष्ट्रपति ओबामा को अक्टूबर में आना था. कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की पूरी कोशिश की गई. साथ ही यहाँ के मानवधिकार की स्थिति को बिगाड़ कर पेश करने की कोशिश भी की गई.
पिछले तीन वर्ष से गर्मियों में राज्य में हालात बिगड़ जाते हैं जिससे पर्यटन के साथ-साथ राज्य को कई प्रकार की क्षति होती है. इस साल इस सिलसिले को तोड़ने के लिए आप क्या कदम उठाये जा रहे हैं?
हमने पूरी कोशिश है कि हम कोई बहाना न दें.
जैसा हंदवारा में पिछले दिनों सेना के हाथों एक नौजवान की सेना की मौत की जो घटना हुई वैसी घटना फिर न हो. सुरक्षा बलों की तरफ से कोई ज़्यादती न हो.
इसके साथ-साथ राज्य के भीतर राजनीतिक प्रक्रिया तेज़ करने की भी कोशिश की जा रही है. राज्य में जल्द ही पंचायत चुनाव होंगे. हम तो पूरी कोशिश कर रहे हैं. आगे देखें ऊपर वाले ने कि़स्मत में क्या लिखा है.
हाल ही में हंदवारा घटना में मारे गए नौजवान के घर से आने के बाद आप ने ट्विट्टर पर लिखा, "अगर मेरी बात मानी जाती तो यह हादसा नहीं होता." वो कौन सी बात थी?
अगर मुझे विवरण देने होते मैं उसी वक़्त दे देता. मैंने कुछ ऐसे सुझाव रखे थे ...ये पहला हादसा नहीं है. ऐसी घटनाएं पहले भी हुई हैं जब गश्त लगाते हुए सुरक्षाकर्मियों ने आवाज़ लगाई जिसे कोई मासूम शहरी, या कोई बहरा न सुन पाया, या फिर दिमाग़ी तौर पर अस्थिर एक व्यक्ति ऐसी घटना में मारा गया.
इन चीज़ों को देखते हुए मैंने कुछ ऐसे सुझाव दिए थे. अच्छी बात है कि अब सेना ने उनको मानकर सिपाहियों को हिदायत दी है और मुझे लगता है उन पर अमल होगा.
सेना के विशेष अधिकार क़ानून को लेकर राजनीतिक दलों और सुरक्षा बलों में मतभेद क्यों हैं?
मैं समझता हूँ कि इसमें राजनीतिक दलों का कोई रोल नहीं है. यह क़ानून लागू करना हालात की मजबूरी थी. हालात ठीक हो जाएं तो इस क़ानून को हटा लिया जाएगा.
इस दिशा में दो बैठकें हुई हैं. जम्मू के लिए भी और कश्मीर के लिए भी. हम उन जगहों की पहचान करने की कोशिश कर रहे है जहाँ हालात ठीक हैं और इस कानून को हटाया जा सकता है.
सेना के रोल को भी कम किया जा सकता है. यह एक प्रशासनिक फैसला है जिससे हम लोगों को राहत पहुंचा सकते हैं.
इस काम के लिए जो समिति बनी है मैं उसका हिस्सा नहीं हूँ. इसमें तीन लोग हैं - जम्मू और श्रीनगर में सेना के कोर कमांडर, पुलिस के डीजीपी और राज्य के गृह सचिव. हम अपना फ़ैसला उनके सुझाव के बाद करेंगे.
पाकिस्तान में बिगड़े हुए हालात को देखते हुए क्या सेना में कटौती करना ग़लत नहीं होगा?
देखिए सेना में कटौती का मतलब यह नहीं कि हम सेना को सीमा पर से हटा देंगे.
हम कह रहे हैं कि हम सेना की उन टूकड़ियों को हटाएंगे जिन्हें चरमपंथ से लड़ने के लिए तैनात किया गया था. जिन इलाकों में चरमपंथ कम हुआ है उन इलाकों से सेना को कम किया जा सकता है.
हम यह नहीं कह रहे हैं कि फ़ौरी तौर इन को हटा दिया जाए.
कश्मीर पर केंद्र के वार्ताकारों की रिपोर्ट आने वाली है परंतु उन्होंने अभी तक अलगावादियों के साथ बात नहीं की है. क्या उनके विचार जाने बिना इस रिपोर्ट का महत्त्व कम नहीं हो जाता?
जब अलगावादी बात करने के लिए तैयार नहीं हुए तो वार्ताकारों ने उनकी जगह आम लोगों से बात की है.
ये आम लोग वही हैं जिनकी लीडरी का दावा अलगावादी करते हैं. उन्होंने सीधे लोगों से बात की और उनसे भी वही बातें सुनने को मिलीं. कुछ लोगों ने आज़ादी की बात की, कुछ ने पाकिस्तान की, कुछ आंतरिक स्वायत्ता का सवाल उठा रहे हैं.
पाकिस्तान के साथ समग्र बातचीत न होने के कारण जम्मू-कश्मीर को क्या ज़्यादा दिक़्कतें आ रही हैं?
यह मैं कई बार कह चुका हूँ कि बातचीत ठीक चले तो उसका सीधा-सीधा फायदा हमें होता है.
अगर वो रुक जाती है तो भी उसका खमि्याज़ा हमें ही भुगतना पड़ता है. ये अच्छी बात है कि हाल ही में भूटान में विदेश सचिवों की बातचीत के बाद जुलाई में दोनों देशों ने बातचीत शुरू करने का फै़सला किया हुआ है.
भले ही उसे समग्र बातचीत का नाम नहीं दिया गया है.
जिस तरह के प्रयास जारी रहे हैं - परदे से सामने या पीछे, आपको लगता है कश्मीर मसले का हल जल्द सामने आ सकता है?
चाहता तो मैं यही हूँ और उम्मीद भी यही है लेकिन असलियत तो हम सबके सामने है.
ये 60 साल से पुराना मसला है. कोई ये उम्मीद करे कि छह महीने के अंदर हम रिपोर्ट पेश करेंगे और उस रिपोर्ट को मंज़ूरी मिल जाएगी और अचानक यह मसला हल हो जाएगा. भूटान के बाद हिंदुस्तान और पाकिस्तान एक दूसरे से बात करेंगे और एक दो मुलाकात के अंदर वो इस मसले के हल के लिए खाका तैयार कर लेंगे यह सब मुमकिन नहीं है.
मैं चाहता हूँ कि बातचीत का सिलसिला न टूटे. मंजिल तय की जानी चाहिए और हमें इस पर देरी नहीं करनी चाहिए.
आपके व्यापक दृष्टिकोण को देखते हुए राज्य के लोगों को आप से काफी उमीदें थी. क्या कारण है कि आप अभी तक इन पर खरे नहीं उतर पाए हैं?
मुझे खुद इस कुर्सी पर बैठते वक़्त यह घबराहट थी कि लोगों कि उम्मीदें इतनी ज़्यादा हैं कि हो सकता है कि मैं उन्हें पूरा न कर सकूं.
लेकिन मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश कर रहा हूँ.
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आपने विधान सभा में जम्मू-कश्मीर राज्य का देश के साथ विलय पर जो प्रश्न उठाया था वो राजनीति से प्रेरित था क्योंकि उसका मकसद विपक्षी पीडीपी के अर्द्ध-अलगाववादी नीतियों को मात देना था?
इस देश के मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस एएस आनंद उनकी किताब में सब स्पष्ट लिखा है.
मैंने संविधान के बाहर कोई बात नहीं कही है.