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अंतिम अपडेट:04:05:04 AM IST

ईश निंदा क़ानून की आग में धधकता पाक

अमरेश द्विवेदी पाकिस्तान में ईश निंदा क़ानून की वजह से कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने पिछले दो दशकों में देश छोड़कर विदेशों में पनाह ली है.

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अमरेश द्विवेदी  पाकिस्तान में ईश निंदा क़ानून की वजह से कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने पिछले दो दशकों में देश छोड़कर विदेशों में पनाह ली है.

इन्हीं लोगों में एक शख्स हैं जेजे जॉर्ज जिन्हें ईश निंदा क़ानून की वजह से 2003 में पाकिस्तान छोड़कर फ्रांस जाना पड़ा.

जेजे जॉर्ज 1981 से पाकिस्तान में वकालत कर रहे थे और एक क़ामयाब वकील थे.

वो पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग को विभिन्न मसलों पर क़ानूनी सलाह देने का काम भी करते थे.

2002 में जब इन्होंने महमूद अख़्तर नाम के एक कादियानी युवक का केस लड़ा तो उन्हें तरह-तरह की धमकियां दी गईं.

धमकियां

उनसे कहा गया कि वो या तो वकालत छोड़ दें या महमूद अख्तर का केस छोड़ दें.

इन धमकियों से तंग आकर जेजे जॉर्ज वकालत की अपनी अच्छी प्रैक्टिस छोड़कर 2003 में फ्रांस चले गए.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि पाकिस्तान के हालात शुरू से ऐसे नहीं थे. 1986 में ईश निंदा क़ानून के आने के बाद से हालात तेज़ी से बदले.

इससे पहले पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता था.

1986 से पहले मुस्लिम, ईसाई सभी संप्रदाय के लोग मिलजुल कर रहते थे. लेकिन जनरल ज़िया उल हक़ ने जब ईश निंदा क़ानून में कई नई धाराएं जोड़ दीं तो अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ गईं.

बेगुनाहों को सज़ा

जेजे जॉर्ज ने बताया कि ईश निंदा क़ानून की वजह से ईसाई समुदाय के लोगों को सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, क्योंकि किसी भी शिकायत पर बिना सबूतों पर विचार किए, दो लोगों की गवाही के आधार पर उन्हें दोषी ठहरा दिया जाता है.

उन्होंने बताया कि ईश निंदा क़ानून की खिलाफ़त करनेवाले सलमान तासीर या शहबाज़ भट्टी कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं.

1990 के दशक में इस क़ानून के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले एक बिशप जॉन जोसफ ने धमकियों से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी.

ऐसा ही एक वाकया 1997 में पंजाब के शांति नगर में हुआ था जब गांव में कुरान के कुछ फटे हुए पन्ने मिलने पर पूरे गांव को आग लगा दी गई थी.

पंजाब प्रांत के गोजरा में भी धार्मिक किताबों के फटे पन्ने मिलने पर ईसाइयों के आठ-दस घरों को जला दिया गया था.

जेजे जॉर्ज ने बताया कि इन मामलों की जब मानवाधिकार संगठनों द्वारा जांच की जाती थी तो ज़्यादातर मामले गलत साबित हो जाते थे. यानि ईश निंदा क़ानून की सज़ा बेगुनाहों को भुगतनी पड़ती थी.

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