राजनीतिक लोगों और दलों का ग्राफ भी शेयर बाजार की तरह चढ़ता और उतरता रहता है. अगर यह उपमा सही है तो कह सकते हैं कि साल के शुरू में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी का भाव बहुत ऊँचा था जो साल ख़त्म होते होते काफी नीचे आ गया है.साल शुरू हुआ तो उनका नाम भारत के संभावित प्रधानमंत्रियों की सूची चल रहा था, लेकिन अब प्रधानमंत्री तो क्या उनकी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में कोई विशेष भूमिका नजर नही आती.
मई 2007 के विधान सभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अकेले बहुमत हासिल किया था. लेकिन दो साल बाद मई 2009 में लोक सभा चुनाव में वह तीसरे नंबर पर आ गई.
इसके बाद से मायावती उत्तर प्रदेश में सीमित होकर रह गई हैं.
और यहाँ उनको स्मारकों और मूर्तियों ने विवाद में बनाए रखा है. मूर्तियों और स्मारकों के चक्कर में माया सरकार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से लड़ती रहीं. फिलहाल इनका काम रुक गया है.
कोर्ट ने मायावती की सबसे महत्वाकांक्षी गंगा एक्सप्रेस वे सड़क परियोजना रोक दी. इसके अलावा 18 हजार सिपाहियों की भर्ती रद्द करने का फैसला भी रद्द कर दिया गया.
राजनीतिक लड़ाई
मायावती के लिए लड़ाई का दूसरा मोर्चा केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी रही.
कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष रीता जोशी और राहुल गांधी व्यक्तिगत रूप से उनके निशाने पर रहे.
मुरादाबाद में रीता जोशी की जुबान फिसलने पर लखनऊ में उनका घर जला दिया गया. और राहुल गांधी के उत्तर प्रदेश दौरे में कई बात विध्न डालने का विवाद मीडिया में आता रहा.
बात-बात पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखना और हर समस्या को केंद्र के ऊपर डालना मायावती की सोची समझी रणनीति बन गई है.
सरकार की स्थिरता के बावजूद उत्तर प्रदेश में उद्योगपति पूंजीनिवेश के लिए नही आए. इन सब कारणों से मायावती पढ़े लिखे युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी नही पैदा कर सकीं.
प्रदेश के कई इलाकों में सूखा रहा तो कई इलाकों में बाढ़ रही.
पूर्वांचल में दिमागी बुखार का कहर जारी रहा. किसानों को बीज, खाद और बिजली पानी की किल्लत झेलनी पड़ी. लेकिन इन मोर्चों पर सरकार का कहीं अता पता नही रहा.
मायावती का नारा था, अपराधों पर नियंत्रण. मगर इस मोर्चे पर भी लोग उनसे खुश नजर नही आते. सारे बड़े अपराधी और माफिया बहुजन समाज पार्टी के झंडे तले आ गए हैं.
औरैया में इंजिनियर मनोज गुप्ता की ह्त्या में सत्तारूढ़ दल के एक विधायक की कथित भूमिका और जबरन धन उगाही के आरोपों ने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री को भी लपेटे में ले लिया.
लोगों का कहना है कि सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ा है कि ईमानदार अफसर घुटन महसूस करने लगे हैं.
दलित कार्ड
आम आदमी और विपक्षी दलों की आवाज तो सरकार सुनती ही नहीं, सत्ताधारी दल के नेता और कार्यकर्ता भी अकेले में अपने को असहाय बताते हैं. सारी सरकार मुख्यमंत्री कार्यालय में सिमट गई है. लगता ही नहीं कि उतर प्रदेश में संसदीय लोकतंत्र है.
उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री इस बात पर गर्व करता है कि वह सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री है.
इस नाते उसका कद हमेशा ऊँचा रहता है, लेकिन मायावती ने अब उत्तर प्रदेश को चार टुकड़ों में बांटने का दाँव चला है, मगर अभी तक किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, न जनता ने, न केंद्र सरकार ने और न अन्य राजनीतिक दलों ने.
जब सारे दाँव बेकार जा रह हैं और सवर्ण मतदाता मायावती से निराश हो चले हैं तो अब वह वापस दलित कार्ड खेल रही हैं.
चाहे अधिकारियों कर्मचारियों के प्रमोशन का मामला हो, नौकरी, जमीन और मकान आबंटन का या फिर सरकारी ठेकों का मामला हो, प्राथमिकता स्वजातीय दलित समुदाय को है.
दलित कार्ड के चलते ही उन्होंने कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग के मामले में भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपना विरोध जताया है.
अभी राज्य विधानसभा का आधा यानी ढाई साल बाक़ी है, लेकिन कई लोग अब मायावती का साथ छोड़कर जाने लगे हैं. शाहिद सिद्दीकी इसका उदाहरण हैं.
यहाँ तक कि बीएसपी संस्थापक कांशीराम के एक और खास सहयोगी बलिहारी बाबू हाल ही में कांग्रेस में शामिल हो गए.
इस सबके बावजूद सरकारी मशीनरी पर मायावती की पकड़ बरकरार है.
इसी पकड़ के चलते उन्होंने दोनों बार उपचुनावों में भारी सफलता पाई. मगर हर कोई जानता है कि उप चुनाव और आम चुनाव में बहुत फर्क है.