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संडे के संडे: पाकिस्तान पर विशेष चर्चा

BBC Hindi

091124202944_mumbai226_copyमुंबई में 26/11 के चरमपंथी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में खटास आई है और बातचीत का दौर ठहरा हुआ है.

हमने इस्लामाबाद के क़ायदे आज़म विश्वविद्यालय के भौतिकशास्त्र के प्रोफेसर रहे एएच नैयर और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर कमलमित्र चेनॉय से जानना चाहा कि 2010 में हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते कैसे रहेंगे.

नैयर साहब, 26/11 की घटना के बाद भारत ने पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाया. आपको क्या लगता है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में फिर से गर्माहट आ सकती है?

26/11 की घटना बेहद निंदनीय थी. मेरे ख़्याल से पाकिस्तान उतनी तेज़ी के साथ वो काम नहीं कर रहा है जो उसे करने चाहिए. लगता है कि पाकिस्तान ने वो लोग पकड़े हैं जिनकी निशानदेही हुई है और अब उन पर मुक़दमा चल रहा है. जहाँ तक पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था का सवाल है तो उसमें बहुत खामियां और न्याय मिलने में बहुत देर लगती है. अगर इस प्रक्रिया के चलते रिश्ते सुधरने में भी देरी हुई तो बहुत बुरा होगा. पाकिस्तान वैसे भी बहुत मुश्किलों में घिरा हुआ है और उसे और मुश्किलें नहीं चाहिए.

प्रोफेसर चेनॉय, पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये कहा था कि पाकिस्तान में किससे बात की जाए. इस बयान का आख़िर क्या मतलब है?

मनमोहन सिंह का बयान ये इशारा करता है कि पाकिस्तान में राजनीति में सेना का बहुत दबदबा है, लेकिन मेरा मानना है कि मनमोहन सिंह को ये बयान नहीं देना चाहिए था. अगर ज़रदारी साहब भी ऐसा ही सवाल पूछते कि भारत में किससे बात की जाए, तो हमें भी बुरा लगता. पाकिस्तान खुद दहशतगर्दी का शिकार है. ज़रूरी है कि दोनों देश बातचीत को आगे बढ़ाएँ. भारत को इन हालात में पाकिस्तान की मदद करनी चाहिए.

लेकिन प्रो चेनॉय भारत का ये मानना है कि जिस मुल्क़ की ज़मीन से 26/11 और दूसरे हमले हुए, उसकी मदद भारत को क्यों करनी चाहिए?

मेरा मानना है कि पाकिस्तान में अगर अस्थिरता बढ़ी, सरकार और सेना की नहीं चली तो पाकिस्तान से और भी दहशतगर्द भारत में आएँगे. तालेबान और लश्करे तैबा की असली दुश्मनी तो भारत से है, वे भारत पर हमला करेंगे. अगर दोनों देशों के बीच बातचीत का दौर शुरू होगा तो खुफ़िया एजेंसियों के बीच बेहतर सहयोग होगा और दोनों को आतंकवाद से लड़ने में मदद मिलेगी.

नैयर साहब, आपको क्या लगता है कि आतंकवाद जैसे संवेदनशील मामले से निपटने में पाकिस्तान कितना गंभीर है?

पाकिस्तान में इस वक़्त सूरते-हाल ये है कि पूरा देश छावनी में तब्दील हो गया है. हर शहर में नाके लगे हुए हैं, गाड़ियों की तलाशी होती है और बंकर के पीछे सशस्त्र जवान होते हैं. दहशतगर्दों का निशाना सशस्त्र बल हैं और सेना पर लगातार हमले हो रहे हैं.

अब तो ये लगता है कि अब तो सैनिकों की जान पर बन गई है और अब तो उन्हें दहशतगर्दों के ख़िलाफ़ निर्णायक कार्रवाई करनी चाहिए. लेकिन दहशतगर्दों की स्थिति और नेटवर्क बहुत मज़बूत हो गया है. उनके पास संसाधन कहाँ से आए, कुछ नहीं पता.

ऐसे में ये समझा जा सकता है कि सेनाओं को दहशतगर्दों से निपटने में मुश्किलें हो सकती हैं. हालाँकि ये भी सही है कि सेना के भीतर भी कुछ ऐसे तत्व हैं जिनके दहशतगर्दों के साथ संबंध हैं और वे उनकी विचारधारा के नज़दीक हैं.

तो नैयर साहब, इन तत्वों पर काबू पाने के लिए सरकार और खुफ़िया तंत्र कुछ काम कर रहा है?

मेरे ख़्याल से सरकार इन तत्वों पर काबू पाने के लिए कुछ न कुछ ज़रूर कर रही है. जब उनकी जान पर ही बन आई है तो वे इन तत्वों के ख़िलाफ़ निश्चित तौर पर कुछ न कुछ कर रहे होंगे.

आप इस्लामाबाद में कई साल रहे और अब लाहौर में रह रहे हैं. आम शहरी के नाते आपको क्या घर से बाहर निकलने पर डर लगता है?

बिल्कुल. डर तो लगता है. जब कभी ट्रैफिक लाइट पर खड़े होते हैं तो ये डर लगता है कि कहीं कोई दहशतगर्द किसी तरफ से आकर खुद को बम से न उड़ा दे. फिर भी क्योंकि रोजमर्रा के कामकाज़ों को टाला नहीं जा सकता इसलिए जीवन तो चल ही रहा है.

प्रोफेसर चेनॉय, आप पिछले कई साल से पाकिस्तान को क़रीब से देख रहे हैं. आपको क्या लगता है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ पाकिस्तान किस हद तक सफल रहा है और किस हद तक उसे आगे जाने की ज़रूरत है?

देखिए, मुंबई में चरमपंथी हमले के बाद जब मैं पहली बार पाकिस्तान गया था तो पहली बार हम लोगों के साथ पुलिस कमांडो के ट्रक थे. जब हम लाहौर की फूड स्ट्रीट में गए तो बहुत से सैन्य बल हमारे साथ थे. मुझे लगता है कि पाकिस्तान में चल रहा है दहशतगर्दी का खेल बहुत सोच समझकर खेला जा रहा है. पाकिस्तान के लिए इन दहशतगर्दों से निपटना बहुत मुश्किल है क्योंकि उसने पहले इसे कभी नहीं झेला है.

तो क्या आप ये कहना चाहते हैं कि पाकिस्तान में आतंकवाद उद्योग के रूप में खड़ा हो गया है?

दो बातें हैं. आतंकवाद उद्योग भी है और जिहाद भी. लोग विचारधारा के कारण भी आतंकवाद से जुड़ रहे हैं. जैसा कि नैयर साहब ने भी कहा कि ख़ुफ़िया एजेंसियों से जुड़े पुराने लोग भी इसमें शामिल हैं. तो सबसे पहले इस ख़तरनाक़ नेटवर्क को तोड़ना होगा.

प्रोफेसर चेनॉय साहब, पाकिस्तान सरकार दहशतगर्दों के खि़लाफ़ लड़ाई में आगे बढ़ रही है या पीछे हट रही है?

मेरा मानना है कि पाकिस्तान सरकार ने शुरू में इसे हल्के में लिया. स्वात और वज़ीरिस्तान में हालात बिगड़े और अमरीका से दबाव बना, उसके बाद पाकिस्तान सरकार हरकत में आई. हालाँकि ख़ुफ़िया तंत्र अभी तक ये पता नहीं लगा सका है कि इसके पीछे आख़िर है कौन.

नैयर साहब, पाकिस्तान में कई लोगों का ये मानना है कि इन तमाम गड़बड़ियों के पीछे भारत का हाथ है. आपकी नज़र में पाकिस्तान में अभी भारत की क्या भूमिका है?

हिंदुस्तान और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियों और सेनाओं ने पहले दिन से एक-दूसरे की ख़िलाफ़त की है. कश्मीर का मसला जस का तस है. सिंध, बलूचिस्तान का मसला हुआ तो वहाँ भारत की भूमिका दिखी. इसके चलते उन्हें अपनी कमज़ोरियों को छिपाने का बहाना भी मिल जाता है.

मेरा मानना है कि भारत का अफ़ग़ानिस्तान में होना और वहाँ के लोगों की मदद करना पाकिस्तान को बहुत बुरा लगा है. पाकिस्तान के लिए सबसे अच्छी स्थिति तब थी जब अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान का राज था. पश्चिम में सीमाएँ अधिक सुरक्षित थी. तो पाकिस्तान तो चाहेगा कि वहाँ तालेबान की वापसी हो. अब तो अमरीका ने भी कहा है कि वे 'अच्छे तालेबान' के साथ बातचीत कर सरकार में हिस्सेदारी देना चाहता है.

चेनॉय साहब क्या आप भी मानते हैं कि 'अच्छे' और 'बुरे तालेबान' होते हैं?

मेरे ख़्याल से तालेबान कोई आम लोग तो हैं नहीं वे तो फौजी हैं. तो उनमें अच्छे-बुरे का फ़र्क़ तो नहीं कर सकते, लेकिन पाकिस्तानी तालेबान और अफ़ग़ानिस्तानी तालेबान हो सकते हैं.

प्रोफेसर नैयर तो क्या अच्छे-बुरे तालेबान की बात इसलिए सामने आई है कि अफ़ग़ानिस्तान में पश्चिमी देशों की सेनाओं की हार हो रही है?

ये बात तो कई बार सामने आ गई है कि पश्चिमी देशों की सेनाएँ अफ़ग़ानिस्तान से हटना चाहती है. अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी कह चुके हैं कि 2013 से अफ़ग़ानिस्तान से सेनाएँ हटानी शुरू कर देंगे. इसके लिए उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में स्थाई सरकार बनानी होगी. तो ऐसे में उन्हें या तो तालेबान को ख़त्म करना होगा या उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी देनी होगी.
दूसरी ओर, तालेबान ने पाकिस्तान में सेना को निशाना बनाना शुरू किया है. जब हमले बढ़ जाएँगे तो कट्टरपंथी राजनीतिक पार्टियां आगे आएँगी और मध्यस्थता की बात करेंगी.
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