जम्मू कश्मीर में उग्र और हिंसक भीड पर काबू पाने और कई मामलों में खुद की जान बचाने के लिए सीआरपीएफ जवानों द्वारा चलाई गई गोलियों से कुछ लोगों की मौत हो जाने का मामला गर्मा रहा है. उधर माओवादियों से लोहा लेते सीआरपीएफ के जवान घने जंगलों में, बिना "जंगल युद्ध" की अच्छी ट्रेनिंग लिए और बिना किसी स्थानीय मदद के लड़ रहे हैं. पिछले तीन महिनों के भीतर माओवादियों द्वारा उन पर चार बार बडे हमले हो चुके हैं.
पिछले 4 साल का रिकार्ड देंगे तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं. 2010 का वर्ष इस अर्धसैनिक बल के लिए सही मायनों में "खूनी" रहा है. इस वर्ष अब तक केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस फोर्स यानी सीआरपीएफ ने जितनी संख्या में अपने जवानों और अधिकारियों को खोया है ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.
एक समाचार पत्र के अनुसार जून 30 तक सीआरपीएफ के 119 सिपाही और अधिकारी मारे गए हैं. पिछले वर्ष यह आँकडा 58 का था और 2008 में 53 और 2007 में मात्र 35 का था. जाहिर है अब माओवादी सोची समझी रणनीति के तहत काम कर रहे हैं और सीआरपीएफ के जवानों को मौत के घाट उतार रहे हैं. उनकी असली चाल एक सुरक्षा दल का मनोबल गिरा देना है.
यह इससे स्पष्ट हो जाता है कि माओवादी आतंकी तत्व कई मामलों में सीआरपीएफ जवानों की हत्या बडे ही घिनौने तरीके से करते हैं. दांतेवाडा में पिछले दिनों हुए हमले के दौरान माओवादियों ने सीआरपीएफ के एक डिप्यूटी कमांडर का सिर धड से अलग कर दिया था जो आज तक नहीं मिला है. उद्देश्य स्पष्त है सीआरपीएफ के भीतर खौफ पैदा करो और उन्हें जंगलों से दूर रखो.
माओवादी जानते हैं कि वे सीआरपीएफ से सीधी लडाई कर जीत नहीं सकते. वे उनसे सीधी गोलीबारी करने से बचना चाहते हैं परंतु घात् लगाकर हमला कर तथा बारूदी सुरंगों में विस्फोट करवा कर अधिक से अधिक जवानों को मारना भी चाहते हैं.

