बाघ और ज़ेब्रा के शरीर पर पट्टियाँ, तेंदूए के शरीर पर गोल चकते, तितली के शरीर और पंखों पर रंग बिरंगी धारियाँ आखिर कैसे बनती होगी? वह क्या है जो तय करता है कि अमुक प्राणी के शरीर पर गोल धब्बे होंगे तो दूसरे के शरीर पर धारियाँ होगी?वाइसकोंसिन-मेडिसन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस विषय पर गहन अभ्यास किया है और उनके मतानुसार प्राणियों के एब्रियोनिक टिस्यू के अंदर मौजूद एक विशेष प्रोटीन मोर्फोजिन की वजह से यह सम्भव होता है. यह प्रोटीन विंगलेस नाम जीन के द्वारा एनकोड होता है.
शोधकर्ताओं ने अपने अभ्यास के लिए फ्रूट फ्लाय कीड़े के शरीर की जाँच की. इस कीड़े के शरीर पर 16 धारियों की जटील सरंचना बनी होती है. शोधकर्ताओं ने पाया कि पंखों के विकास के समय मोर्फोजिन सक्रीय होता है और धमनियों के किनारों और जहाँ दो धमनियाँ आपस में मिलती हैं उन स्थानों पर स्थित कोषों को पिगमेंट उत्सर्जित करने के लिए प्रोत्साहित करता है. विंगलेस कोष निश्चित समय पर निश्चित स्थान पर भेजा जाता है और उसकी वजह से उस स्थान पर धब्बा या धारियाँ बनती है.
नेचर जनरल में प्रकाशित खबर के अनुसार सीन कैरोल की अगुवाई वाले दल ने पाया कि यदि विंगलेस जीन को कीड़े के जीनोम में अलग अलग स्थानों पर डाला जाए तो कुछ नए पैटर्न बनाए जा सकते हैं. इससे कुछ अनोखे कीड़े बन सकते हैं जिनके शरीर पर धब्बों की जगह धारियाँ हो या धारियों की जगह धब्बे हों.
यह व्याख्या मात्र कीट पतंगो के ऊपर ही लागू नहीं होती. शोधकर्ताओं का मानना है कि कई प्राणियों के संदर्भ में भी कहा जा सकता है कि उनके शरीर पर मौजूद धारियों और धब्बों के पीछे यही वैज्ञानिक तथ्य कार्य करता है. इस पैटर्न को हम चाहें तो बदल भी सकते हैं.

