वे कौन सी ऐसी बातें हैं जो इंसानों को जानवरों से अलग करती है? इंसानों में समझ होती है, उनमें भाषा विकसित करने की क्षमता होती है, वे यंत्रों का उपयोग कर सकते हैं, उनमें सांस्कृतिक विविधताएँ होती है, और उनमें आपसी समझ होती है. आम तौर पर माना जाता है कि जानवरों में यह समझ विकसित नहीं हुई है और इसलिए इंसान उनसे बीस साबित होते हैं. परंतु पिछले कुछ वर्षों से कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जिससे पता चलता है कि जानवरों में भी ये सारी समझ होती है. कौए अपने लिए अलग अलग प्रकार के टूल या यंत्र बना सकते हैं और चिपांजी परिवार में रहना जानते हैं. अब एक नई शोध बताती है कि चिपांजियों में मौत की समझ होती है. यानी उन्हें इस बात का अहसास होता है कि "मृत्यु" क्या होती है.
यूनिवर्सिटी ऑफ स्टरलिंग के शोधकर्ताओं ने एक सफारी पार्क के चिपांजियों के व्यवहार का अध्ययन कर यह पता लगाया कि चिपांजी मृत्यु के प्रति सचेत होते हैं. इस टीम ने पता लगाया कि चिपांजी किसी की मृत्यु हो जाने पर कैसा व्यवहार करते हैं, और मृत्यु से ठीक पहले उनकी भावनाएँ कैसी होती हैं.
चिपांजियों के समूह के किसी युवा चिपांजी की अचानक मृत्यु हो जाने पर समूह के बाकी के सदस्यों में असमंजसता और बैचेनी व्याप्त हो जाती है तथा वे जोर जोर से चिल्लाने लगते हैं. परंतु किसी वृद्ध चिपांजी की मृत्यु होने पर वे ऐसा व्यवहार नहीं करते. शोधकर्ताओं की टीम ने एक वृद्ध मादा चिपांजी की मृत्यु का वीडियो तैयार किया. शोधकर्ताओं ने पाया कि मादा चिपांजी की मृत्यु से पहले पूरा समूह उसके पास था और सभी चिपांजी शांत थे. वे उस मादा चिपांजी को सहला रहे थे. जब उस मादा चिपांजी की मृत्यु हो गई तब भी सभी चिपांजी शांत ही रहे. उनके अंदर दुख की भावना देखी गई. बाद में चिपांजियों का समूह वहाँ से चला गया परंतु उस मादा चिपांजी की युवा बेटी लौट आई और पूरी रात अपनी माँ की लाश के पास ही रही. सुबह उस पार्क के व्यवस्थापकों ने मादा चिपांजी की लाश हटा ली.
इसके बाद भी समूह के अन्य चिपांजियों के अंदर शोक की भावना जागृत रही. शोधकर्ताओं ने देखा कि वह मादा जहाँ सोती थी, उसकी मृत्यु के बाद भी वहाँ अन्य चिपांजी नहीं सोते थे. हालाँकि सोने के लिए वह जगह बहुत ही उपयुक्त थी. ऐसा कई दिनों तक चला और धीरे धीरे सब चिपांजी सामान्य हो गए. यह ठीक वैसा ही व्यवहार है जैसा इंसानों में देखा जाता है.
एक अन्य उदाहरण - एक युवा मादा चिपांजी के नवजात शिशु की फ्लू से मृत्यु हो गई. इससे उस मादा चिपांजी को इतना गहरा सदमा लगा कि वह अपने बच्चे की लाश को अपने साथ ही रखने लगी. शोधकर्ताओं ने ऐसा ही व्यवहार अन्य चिपांजियों में भी पाया. नवजात शिशु की मृत्यु हो जाने पर भी मादा चिपांजी उसे छोड़ती नहीं है और दिनों, सप्ताहों और कभी कभी तो महिनों तक अपने साथ लेकर घुमती है. बाद में धीरे धीरे वह उस लाश को छोड़ने लग जाती है और फिर एक दिन हमेशा के लिए विदा कर देती है.
इन उदाहरणों से पता चलता है कि चिपांजियों में भी मृत्यु और किसी नजदीकी परिजन के हमेशा के लिए चले जाने की समझ होती है, और इसका उनपर गहरा प्रभाव पड़ता है. इससे यह भी साबित होता है कि इंसानों और जानवरों के बीच का भेद उतना भी गहरा नहीं है जितना माना जाता है.

