पिछले कुछ वर्षों से इलैक्ट्रिक दुपहिया और चारपहिया वाहनों का चलन काफी बढा है. इस तरह के वाहन बनानी वाली मोटर कम्पनियाँ मुख्यत: दो दावे करते हैं पहला यह कि इलैक्ट्रिक वाहन से परिवहन सस्ता पड़ता है और दूसरा यह कि इनसे पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुँचता है. इलैक्ट्रिक वाहन से परिवहन सस्ता पड़ता है क्योंकि इसमें महँगे जैविक ईंधन का इस्तेमाल नहीं होता और यह बैटरी से चलता है. दूसरी तरफ चुँकि ये वाहन कार्बन उत्सर्जित नहीं करते तो पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुँचता.परंतु विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ये दोनों ही दावे गलत साबित होते हैं. इलैक्ट्रिक वाहन ना तो सस्ते पड़ते हैं ना ही इनसे पर्यावरण को सुरक्षा प्राप्त होती है. इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलोजी के विशेषज्ञों के अनुसार इलैक्ट्रिक कारों में इस्तेमाल होने वाली बैटरी की तकनीक इतनी पुरानी है कि वह मात्र दो वर्ष में ही अनुपयोगी बन जाती है और उसे बदलना होता है. नई बैटरी महँगी आती है और पुरानी लीथियम बैटरी से पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है.
इस तरह से इलैक्ट्रिक कार काफी महँगी पड़ जाती है. दुपहिया वाहनों के साथ भी ऐसा ही है. 40 की रफ्तार प्रदान करने वाले दुपहिया स्कूटर की बैटरियाँ प्रति 2 वर्ष बदलाने की आवश्यकता पडती है और उनकी कीमत करीब 10,000 रूपए के आसपास होती है. जाहिर है 2 वर्ष के दौरान किसी अन्य दुपहिया वाहन में भरे जाने वाले ईंधन की कीमत इससे कम ही होगी.
दूसरी तरह इलैक्ट्रिक कारें निर्माता कम्पनियों के दावों के विपरित बेहद कम माइलेज देती है. अनुपात की दृष्टि से देखा जाए तो एक कार फुल बैटरी चार्ज के बाद करीब 160 किमी का सफर तय करती है. परंतु अन्य परम्परागत कारें इससे कहीं अधिक दूरी तय कर सकती है और यह फासला इतना बडा है कि प्रयोक्ता इलैक्ट्रिक कार की बजाय परम्परागत कार ही खरीदना पसंद करता है.
डेली मेल की खबर के अनुसार फोर्ड फोकस और फॉक्सवैगन गोल्फ जैसी कारें एक बार टंकी फुल कराने के बाद 570 किमी तक का फासला तय कर सकती है. यदि इलैक्ट्रिक कार को इस समकक्ष बनाया जाए तो उसके लिए 1.5 टन की बैटरी की आवश्यकता पड़ेगी और खर्च इतना बढ जाएगा की कार खरीदना ही असम्भव हो जाए.
कहने का अर्थ यह कि इलैक्ट्रिक वाहनों की तकनीक को परिष्कृत करने की आवश्यकता है. फिलहाल ये वाहन मात्र "फेंटासी" है.

