नेत्रहीन व्यक्ति देख नहीं सकते, परंतु उनका दिमाग भी ठीक उसी तरह से काम करता है जिस तरह से देख सकने वाले व्यक्ति का करता है. एक शोध के अनुसार नेत्रहीन व्यक्ति किसी औजार का उपयोग करने संबंधित बात ठीक उसी तरह से सोचते हैं जैस तरह से कोई देख सकने वाला व्यक्ति सोचता है. किसी औजार से काम लेते समय या उसके बारे में सोचते समय नेत्रहीन व्यक्ति के दिमाग का वही हिस्सा जागृत होता है जो हिस्सा देख कर काम करने वाले व्यक्ति के दिमाग का होता है.
यह हम पहले से जानते हैं कि नेत्रहीन व्यक्ति यदि किसी वस्तु की जाँच करता है या उसे टटोलता है तो उसके दिमाग का वह हिस्सा सक्रीय हो जाता जो हिस्सा देख सकने वाले व्यक्ति का होता है जब वह किसी वस्तु को देखता है. इस संबंध में एक शोध कुछ वर्षों पहले ब्रैडफोर्ड मेहोन और उनकी टीम ने की थी.
इस शोध को आगे बढाते हुए शोधकर्ताओं ने यह जाँच की कि क्या किसी औजार से किस तरह से काम लेना है यह सोचते समय भी नेत्रहीन और सनेत्र व्यक्ति के दिमाग के एक ही हिस्से सक्रीय होते हैं?
इसके लिए शोधकर्ताओं ने कुछ नेत्रहीन और कुछ सनेत्र स्वयंसेवकों के दिमाग का एमआरआई स्कैन करवाया. इस प्रक्रिया के दौरान स्वयंसेवकों को कुछ शब्द सोचने के लिए दिए गए. जैसे कि - बिल्ली, कांटा, पशु, तितली, कुल्हाडी, टेबल, पलंग आदि.
इस दौरान उनके दिमागी हलचल को स्कैन किया गया. इससे पता चला कि नैत्रहीन व्यक्ति जब सोचते हैं उनके दिमाग का भी वही हिस्सा सक्रीय होता है जो सनैत्र व्यक्ति का होता है. यहाँ तक कि जो लोग जन्म से नैत्रहीन हैं उनमें भी यही स्थिति पाई गई.
इस शोध से जुड़े शीर्ष वैज्ञानिक डॉ. मेहोन के अनुसार - पिछली मान्यताओं के विपरित अनुभवों का हमारे दिमाग पर उतना असर नहीं होता. दिमाग जिनेटक रूप से कार्यरत है और कुछ क्रियाएँ अमुक जगह पर ही करने के लिए बाध्य भी.

