एक बार ठोकर खा चुका आदमी दूसरी बार वही गलती फिर से दोहराने की हिम्मत नहीं कर पाता. इसी के आधार पर यह कहावत भी बनी है - "दूध का जला छाछा भी फूंक फूंक कर पीता है". यानी कि किसी वजह से शारीरिक या मानसिक कष्ट उठा चुकी इंसान उसी तरह की या उससे कम सम्भावित खतरे वाली गलती को करने से पहले दो बार सोचता है. परंतु हमारा यह व्यवहार किस तरह से बनता है? ऐसा करते समय हमारे दिमाग में क्या चलता है?इस बात का पता लगाने के लिए मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोबायोलोजी के वैज्ञानिकों ने कुछ छोटी मक्खियों के ऊपर एक प्रयोग किया. वैज्ञानिकों की एक टीम ने इन मक्खियों को एक विशेष प्रकार की गंध के प्रति सचेत करने के लिए बिजली का हल्का झटका देना शुरू किया. जब भी मक्खियाँ उस विशेष गंध वाले मशरूम के ऊपर से गुजरती उन्हें बिजली का झटका दिया जाता. कुछ समय बात मक्खियों ने सीख लिया कि इस गंध से दूर रहना है. इसके बाद मक्खियाँ उस गंध के समीप जाते ही तुरंत वापस लौट जाती.
अब वैज्ञानिकों ने उन तीन नर्व कोषों का पता लगा लिया है जो मक्खियों के इस व्यवहार के लिए जिम्मेदार होते हैं. यही नहीं वैज्ञानिकों ने तापमान में बदलाव कर मक्खियों के शरीर में स्थित इन नर्व कोषों को प्रभावित करने में भी सफलता पाई है.
वैज्ञानिकों को इस बात का अहसास पहले से था कि मक्खियों के दिमाग में करीब 2000 नर्व कोष होते हैं और उन्हें किसी सम्भावित खतरे से दूर रहने की सलाह डोपमाइन न्यूरोट्रांसिमटर से मिलती है. परंतु अभी तक य ज्ञात नहीं था कि वे कौन से कोष हैं जो डोपमाइन उत्सर्जित करते हैं. परंतु अब इस बात की सटीक जानकारी उपलब्ध हो गई है.
भविष्य में इसी तरह के प्रयोग इंसानों के ऊपर भी किए जाने हैं और इससे पता चलेगा कि हमारे शरीर के न्यूरो सिस्टम का कौन सा भाग हमें खतरे के प्रति आगाह करता है. इससे इंसान की सवेंदनाओं पर काबू पाने का जरिया खोजा जा सकेगा.

