क्या कभी ऐसा हुआ कि किसी व्यक्ति से बात करते समय या उसके तुरंत बाद आप अनजाने में उसके जैसे ही बोलने का प्रयत्न करने लगे हों? ऐसा सब लोगों के साथ होता है और इसके लिए हमारे जीन को जिम्मेदार माना जा सकता है.इंसानों के दिमाग के अंदर दूसरों से मित्रता स्थापित करने का नैसर्गिक गुण विद्यमान होता है. हम जान अनजाने लोगों से बात करते समय उसकी वाक प्रणाली की नकल करने लगते हैं और हमें इसका पता भी नही चलता.
एटेंशन, पर्सेपशन एंड साइकोफिजिक्स जर्नल में छपी रिपोर्ट के अनुसार हमारे अंदर "नकल" करने की नैसर्गिक क्षमता मौजूद है, जो हमें दूसरों के साथ मित्रता स्थापित करने में मदद करती है. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं के अनुसार हमारा अवचेतन मन सामने वाले व्यक्ति के हावभावों, उसके बोलने के तरीकों, उसके खडे रहने के तरीकों तथा उसके बोलने की गति, बोलने में लगने वाले समय आदि की भी नकल करने लगता है.
शोधकर्ताओं के अनुसार हम किसी विदेशी व्यक्ति से बात करते समय भी उसके जैसे बोलने का प्रयत्न करने लगते हैं. ऐसा हमारे अवचेतन मन की वजह से होता है और हमें इसका अहसास नहीं हो पाता. परंतु इससे अमूमन क्षोभजनक स्थिति उत्पन्न हो जाती है.
यही वजह है कि किसी विदेशी स्थल पर लम्बे काल तक रहने से हम वहाँ के मूल लोगों की तरह बोलने लगने हैं. ना केवल हमें वहाँ की भाषा समझ आने लगती है बल्कि उन लोगों की तरह शब्दों के उतार चढाव पर भी हमारी पकड़ आ जाती है.

