भारतीय वायुसेना ने हाल ही में अमेरिकी बनावट के 24 हार्पून ब्लॉक-2 एंटी शिप मिसाइल खरीदने का ऑर्डर दिया है. यह सौदा 17 करोड़ डॉलर का है. हार्पून ब्लॉक-2 मूलत: हार्पून मिसाइल का ही परिष्कृत संस्करण है. आइए जानें क्या है इस मिसाइल की विशेषताएँ - व्हेल का शिकार करने के लिए जिस भालानूमा हथियार का इस्तेमाल होता है उसे हार्पून कहा जाता है. इस नाम की तर्ज पर इस एंटी शिप मिसाइल का नाम हार्पून रखा गया है. हार्पून मिसाइल का अति आधुनिक सोफ्टवेर कमांड सेंटर के सम्पर्क में रहता है. इसे लड़ाकु जहाज से दागा जाता है परंतु इसके लिए जहाज को दुश्मन के नजदीक जाने की आवश्यकता नहीं होती. दुश्मन की जहाज से 125 किलोमीटर दूर से ही लडाकु जहाज हार्पून मिसाइल को दाग कर वापस लौट सकता है. इसके बाद हार्पून का सम्पर्क कंट्रोल सेंटर से बन जाता है, जहाँ से उसे निर्देश मिलते रहते हैं.
हार्पून ब्लॉक-2 में जीपीएस सिस्टम लगा है. जिससे मिसाइल अपने स्थान और दुश्मन की जहाज के बदल रहे स्थान पर नज़र रखकर उस हिसाब से अपनी दिशा मोड सकती है. इसके अलावा इसमें इनर्शियल गाइडेंस सिस्टम भी लगा है जो मिसाइल को दुश्मन के द्वारा छोडी जा रही विकिरणों तथा रेडियो एक्टिव तरंगो की तरफ ध्यान देने से रोकता है. और इससे मिसाइल किसी धोखे में आए बिना अपने लक्ष्य की तरफ बढती ही रहती है. अंत में यह मिसाइल दुश्मन के जहाज की पहचान कर उसे नष्ट कर देती है. यदि जमीन पर खड़े जहाज का रंग जमीन के रंग से मिलता जुलता हो तो भी वह उसे अलग चिह्नित कर पाती है.
रणनीति -
एक ध्यान देने योग्य बात यह है कि हार्पून एंटी शिप मिसाइल है. इसलिए इसका उपयोग आम तौर पर तो नौसेना द्वारा किया जाना चाहिए. तो फिर इसका सौदा भारतीय वायुसेना ने क्यों किया?
इस प्रश्न का जवाब यह है -
1971 के युद्ध में भारत ने शुरू में ही पाकिस्तान की कमर तोड़ दी थी. तब भारतीय नौसेना की जहाजों ने अपनी मिसाइलों से कराची बंदरगाह पर तीव्र हमला कर उसे तहस नहस कर दिया था. इससे पाकिस्तान की नौसेना को जबरदस्त झटका लगा था. आज पाकिस्तान के पास एरियान और अटलांटिस श्रेणी के अच्छे टोही विमान है. इसलिए इस तरह के हमले करना अब सम्भव नहीं है.
इसका हल है ऐसे लडाकु जहाज जो नीचली सतह पर तेजी से उडान भरकर रडार के सम्पर्क में आए बिना दुश्मन की जमीन तक पहुँच जाए और ये विमान ऐसी मिसाइलों से लैस हों तो अति आधुनिक हो और जिन्हें रोक पाना दुष्कर हो.
भारतीय वायुसेना के पास ऐसा ही एक लडाकु जहाज है - जगुआर. जगुआर मात्र 60 मीटर की ऊँचाई पर उडान भर सकता है और पलों में कराची बंदरगाह तक पहुँच सकता है. इसलिए हार्पून मिसाइलों को भी वायुसेना ने ही खरीदा है.
हार्पून के बारे में -
लम्बाई - 4.6 मीटर
व्यास - 34 सेंटीमीटर
वजन - 691 किलो
गति - 1050 किलोमीटर प्रति घंटा
रेंज - 124 किलोमीटर
एक मिसाइल की कीमत - 3.5 करोड़ रूपए
दहन - टर्बोजेट इंजिन, सोलिड फ्यूल
प्लेटफार्म - हवा और जमीन, जहाज, पानी से दागी जा सकती है
- हार्पून का विकास मैक्डोनल डगलस ने किया था जिसे अब बोइंग डिफेंस के नाम से जाना जाता है.
- हार्पून का उत्पादन 1975 से शुरू हुआ था और इसे 1977 मे सेना मे शामिल किया गया.
- दुनिया के 29 देश हार्पून मिसाइल खरीद चुके हैं.
- अमेरिका ने भारत को हार्पून ब्लॉक 2 मिसाइल बेची है. परंतु वह पाकिस्तान को 30 इसी श्रेणी की मिसाइल देने वाला है.
- पाकिस्तान को 1985 से लेकर 1988 तक 37 पुरानी हार्पून मिसाइल भी दी गई थी.
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