Wednesday, May 23rd

अंतिम अपडेट:04:05:04 AM IST

अग्नि-5, निर्भय और मिसाइल डिफेंस; भारत का चीन को जवाब

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agni-5भारत ने स्वदेशी तकनीक से तैयार अग्नि-3 मिसाइल का सफल प्रक्षेपण कर लिया है और इसके साथ ही भारत को 3000 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता प्राप्त हो गई है.

अग्नि-3 की जद में सम्पूर्ण पाकिस्तान आ जाता है लेकिन चीन के कुछ हिस्से अभी भी इसकी रेंज से बाहर के हैं. और इसलिए भारत अग्नि-5 नामक मिसाइल भी तैयार कर रहा है. अग्नि 5 अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल होगी जो 5000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करेगी.

अग्नि-5 की जद में पूरा चीन आ जाएगा और इसलिए यह मिसाइल भारत के सामरिक कार्यक्रम के लिए काफी महत्वपूर्ण है.

अग्नि मिसाइल कार्यक्रम के निदेशक अविनाश चंदर के अनुसार भारत की सबसे अधिक दूरी तक मार करने वाली अग्नि-5 मिसाइल चीन की मिसाइलों का जवाब होगी.

अग्नि-5:

अग्नि-5 का परीक्षण इस वर्ष किए जाने की सम्भावना है. यह मिसाइल 17.5 मीटर लंबी होगी और इसका वजन 55000 किलो से अधिक होगा. अग्नि-5 तीन चरणों वाली मिसाइल होगी. इस मिसाइल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना सरल होगा.

डीआरडीओ द्वारा विकसित की जा रही यह मिसाइल 5000 से लेकर 6000 किलोमीटर तक वार करेगी. सोलिड फ्यूल का इस्तेमाल करने वाली यह मिसाइल तीन चरणों में अपने लक्ष्य तक जाएगी. एक मिसाइल की कीमत करीब 30 करोड़ रूपए होगी.

निर्भय:

निर्भय भारत की स्वदेशी सबसोनिक क्रुज मिसाइल है, जिसका निर्माण कार्य जारी है. अभी तक प्रारम्भिक चरण मे विकसित हो रही यह मिसाइल वर्तमान ब्रह्मोज़ मिसाइल से भी खतरनाक होगी. ब्रह्मोस मिसाइल की रेंज करीब 300 किलोमीटर तक है जबकि निर्भय की रेन्ज 1000 किलोमीटर तक होगी.

सेना के तीनों अंग थल सेना, वायु सेना और नौसेना इस क्रुज मिसाइल का उपयोग करेंगे.

मिसाइल डिफेंस:


मिसाइल डिफेंस सिस्टम के तहत दुश्मन देश के द्वारा दागी गई मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर दिया जाता है. अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और भारत जैसे देश इस सिस्टम को विकसित कर चुके हैं या करने की तैयारी में हैं.

भारत अगले महीने अपने बैलेस्टिक मिसाइल रोधी कार्यक्रम का परीक्षण करेगा. इसके तहत वायुमंडल के भीतर 15 से 16 किमी के दायरे वाली मिसाइल का परीक्षण किया जाएगा. अगले चरण में इससे भी अधिक ऊँचाई पर मिसाइल को मार गिराने की क्षमता विकसित की जाएगी.

उल्लेखनीय है कि मिसाइल निरोधक तंत्र के विकास में चीन से आगे चल रहा है. भारत को उम्मीद है कि इस सिस्टम का पहला चरण 2012 तक पूरा हो जाएगा.
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