क्या मोबाइल फोन से शिक्षा में बाधा उत्पन्न होती है? क्या मोबाइल फोन की मदद से अच्छी शिक्षा दी जा सकती है? ये दोनों सवाल विरोधाभासी हैं और दोनों के जवाब भी. क्योंकि मोबाइल फोन एक ऐसी डिवाइज़ बन गया है जो अति उपयोगी भी है और यदि इसका उपयोग विवेकपूर्ण तरीके से ना किया जाए तो इससे व्यवधान भी उत्पन्न होता है.
इसलिए जहाँ एक और सरकारें और संस्थाएँ शैक्षणिक गतिविधियों से मोबाइल फोन को दूर रखना चाहती है वहीं कुछ संस्थान मोबाइल फोन का ही इस्तेमाल कर जानकारियों को बेहतर ढंग से विद्यार्थियों तक पहुँचाने का कार्य कर रही हैं.
गुजरात सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर स्कूलों और कॉलेजों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है. अब स्कूली विद्यार्थी तथा शिक्षक स्कूलों में मोबाइल फोन नहीं ले जा पाएंगे. यह एक दंडनीय अपराध होगा. कॉलेज जाने वाले विद्यार्थी हालाँकि मोबाइल फोन साथ ले जा पाएंगे परंतु उनको हर उस स्थान पर मोबाइल फोन को स्विच ऑफ कर देना होगा जो शैक्षणिक गतिविधि से जुड़ा हो, जैसे कि कक्षा, लेबोरेटरी और लाइब्रेरी.
गुजरात सरकार के इस कदम का जहाँ कुछ विद्यार्थियों और अध्यापकों ने स्वागत किया है वहीं विद्यार्थियों का एक धड़ा इसे अपने मौलिक अधिकारों का हनन मान रहा है. परंतु गुजरात सरकार का कहना है कि मोबाइल फोन शैक्षिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न करते हैं और उनका कक्षाओं में कोई काम नहीं है.
आइए अब एक ऐसे संस्थान की बात करते हैं जहाँ यह माना जाता है कि मोबाइल फोन का सदउपयोग कक्षाओं में भी हो सकता है. यह है न्यूज़ीलैंड की होविक कॉलेज. इस कॉलेज में एक पायलट अभ्यास किया जा रहा
है. इसके तहत अधिकारी यह जाँचने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर विद्यार्थियों की रूचि शैक्षणिक गतिविधियों में बढाई जा सकती है?
इसके लिए एक नया सिस्टम चालू किया गया है जिसका नाम है "एम-लर्निंग". इसके तहत विद्यार्थियों को एक मुफ्त सोफ्टवेर दिया गया है जो कम्प्यूटर पर उपयोगी फाइल फोर्मेटों को सेलफोन स्टडी नोट में बदल देता है.
विद्यार्थी एमएस ऑफिस पावरपोइंट का इस्तेमाल कर सवालों का हल प्राप्त करते हैं, स्प्रेडशीट बनाते हैं. माइक्रोसोफ्ट के मूवीमैकर का इस्तेमाल कर फिल्म असाइनमेंट का सम्पादन करते हैं और फिर इन सभी
जानकारियों को सेलफोन में स्थलांतरित कर दिया जाता है. इस तरह से विद्यार्थियों के सारे असाइनमेंट उनके जेब में आ जाते हैं. वे कहीं भी जाकर उन्हें पढ सकते हैं, चर्चा कर सकते हैं और मित्रों के साथ साझा कर
सकते हैं. वे अपनी बनाई फिल्मों को घर जाकर देख सकते हैं और अभिभावकों को भी दिखा जा सकते हैं.
होविक कॉलेज के प्रोफेसर नाथन केर्र की इस पहल को विद्यार्थी हाथों हाथ ले रहे हैं. यह तकनीक काफी अच्छी तरह से काम कर रही है और अब मोबाइल फोन इस संस्थान की शैक्षणिक गतिविधियों का एक हिस्सा
बन चुका है. इस बारे में नाथन केर्र का कहना है कि - हम काफी रचनात्मक लोग हैं. इसकी वजह यह है कि न्यूज़ीलैंड के अध्यापकों को खुली छूट मिलती है कि वे कुछ नया सोचें और अमल में भी लाएँ. बाकी जगहों
की तरह कोई समिति या सरकार यह तय नहीं करती कि अध्यापकों को कब क्या करना है!
वाकई.

