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अंतिम अपडेट:04:05:04 AM IST

अब अपना मनचाहा शरीर पाइए, "डिजिटली सम्पादित"

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new-softwer-body-changeलेकिन मात्र फिल्म में, वास्तविकता में नहीं. क्या आप अपने मोटापे की वजह से परेशान हैं और इसी वजह से अपना वीडियो उतारा जाना पसंद नहीं करते. अब आप अपने वीडियो "अवतार" को अपने मनपसंद तरीके से बदल पाएंगे. एक नए सोफ्टवेर की मदद से किसी भी व्यक्ति के शरीर का डिजिटली सम्पादन किया जाना सम्भव हुआ है.


जर्मनी के मैक्स प्लाक इंस्टिट्यूट ऑफ इनफोर्मेटिक्स के क्रिस्टन थिओबाल्ट ने अपने साथियों के साथ मिलकर यह सोफ्टवेर विकसित किया है. इस सोफ्टवेर की मदद से अनुभवी तथा गैर अनुभवी फिल्म निर्माता काफी सरलता से अपने पात्रों के शरीर का डिजिटल सम्पादन कर पाते हैं जिससे उन्हें पर्दे पर अपने पात्रों को उसी तरह से दिखाने की सुविधा प्राप्त होती जैसा कि वे चाहते हैं.

ऐसा नहीं है कि यह सोफ्टवेर कुछ ऐसा करने की सुविधा प्रदान करता है जो अभी तक असम्भव था. अभी भी वीडियो फूटेज का डिजिटल सम्पादन होता ही है, परन्तु इस सोफ्टवेर की मदद से यह कार्य काफी सरल हो गया है. यह सोफ्टवेर इस मामले में काफी अलग है कि यह फ्रेम दर फ्रेम सम्पादन पर आधारित नहीं है.

कैसे काम करती है यह तकनीक?
इस तकनीक को विकसित करने के लिए थियोबाल्ट और उनकी टीम ने अलग अलग आकार, कद, वजन आदि के 120 पुरूष और महिलाओं की अलग अलग पोज में तस्वीरें खींची. इसके बाद इन तस्वीरों के स्कैन संस्करण को आपस में मिलाकर अलग अलग त्रिआयामी मॉडल तैयार किए गए. ये मॉडल किसी भी अन्य शारीरिक ढांचे के ऊपर मोर्फ हो सकते थे.

अब थियोबाल्ट ने एक वीडियो फूटेज लिया जिसमें एक कलाकार को दिखाया गया था और जिसके शरीर को सम्पादित करना था. थियोबाल्ट ने कुछ आधुनिक सोफ्टवेरों की सहायता से उस कलाकार के हलन चलन की फूटेज में से उसके आकार का सिलहोट [एक रंगीय आकार] तैयार किया.

उसके बाद एक विशेष सोफ्टवेर की मदद से उस सिलहोट को त्रिआयामी मॉडल के साथ मोर्फ कर दिया गया और इससे वांछित कद, वजन, पैरों की लम्बाई आदि प्राप्त की गई. इससे उस कलाकार का शरीर काफी बदल गया परंतु फिर भी वह वास्तविक लग रहा था.

इससे अब किसी भी पुरूष या महिला मॉडल के शरीर को शूटिंग के बाद आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है. उदाहरण के लिए पुरूष के शरीर को अधिक मजबूत दिखाया जा सकता है या फिर मोटापा कम किया जा सकता है. वहीं महिलाओं के शरीर के अधिक सुंदर एवं सुडौल दिखाया जा सकता है.



इस बात का परीक्षण करने के लिए कि क्या डिजिटली सम्पादित फूटेज में क्या बदलाव हुआ है वह आम लोगों को पता चलता है या नहीं, थियोबाल्ट और उसकी टीम ने 150 लोगों को मूल फिल्म दिखाई और इतने ही दूसरे लोगों को सम्पादित फिल्म. दोनों समूह के लोगों को ये फिल्में वास्तविक लगी. इससे साबित हुआ कि इस तरह से सम्पादित फिल्म मूल फिल्म जितनी ही वास्तविक लगती है.

इस तकनीक का इस्तेमाल फिल्मों में हो सकता है. अब कलाकारों को अपने पात्र के हिसाब से वजन कम या अधिक करने की जहमत नहीं उठानी पडेगी. यही नहीं इस तकनीक का इस्तेमाल विज्ञापन बनाने वाली कम्पनियाँ भी कर सकती हैं. जो अलग अलग देशों की संस्कृति के हिसाब से अपनी फिल्मों के पात्रों के शरीर का सम्पादन कर पाएंगी.

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