औरतो के अनेक रुप तो मर्दो के क्या कम है??
आज मेरी एक दोस्त के साथ फिर से बबाल हो गयी मैं CROSSWORD BOOK STORE मे कुछ पुस्तके देख रहा था और मेरी दोस्त को भी साथ ले गया था तभी मैंने एक पुस्तक पढी जिसमे एक फेमिनिस्ट महिला के विचार लिखे थे जिनका मानना था की दुनिया के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिये मर्दो का कम होना जरुरी है, इसिलिये अब से नर बच्चो को पैदा नहि होने देना चाहिये खेर मुझे तो यह बात सुन कर हंसी आ गयी तो मैंने मेरी मित्र को यह बात बतायी उसने यह बात का समर्थन तो नहि किया लेकिन मुझे औरतो के मर्दो पर कितने उपकार है वो गिनाना शुरु कर दिया
अब यह बात सही है कि मर्दो को हर रुप मे औरतो कि मदद और सहारा (साथ शब्द थोडा घमंड दिखायेगा ) चाहिये लेकिन यह फेमिनिस्ट लोग औरतो पे हो रहे हर अत्याचार के लिये सिर्फ मर्दो को जिम्मेदार नहि ठहरा सकती घर मे नयी आयी हुइ बहु को ससुर या पति से ज्यादा सास परेशान करती है अगर पति परेशान करे तो सास को बहु कि मदद करनी चाहिये लेकिन यह फेमिनिझम का झंडा पकडनेवाली महिलाये तो सिर्फ मर्दो पे आरोप लगायेगी महिलाओ को मर्दो पे आरोप लगाने से पहले खुद अपने आप को दुसरी महिलाओ पे अत्याचार करते हुए रोकना चाहिये " क्योंकि हर मर्द अपने बाप(नर) से ज्यादा अपनी मां (जेसे मैं:D) या अपनी बीबी (नारी) को सुनता है!" कोख मे से अगर बच्ची का abortion होता है तो वह कोख औरत की होती है औरत को अपनी कोख की बच्ची गिरवाने के लिये जिम्मेदार सिर्फ उसका पति नहि लेकिन उसकी सास और आस पास की औरते भी होती है, जो हर दोपहर को अपनी टाईम पास गपशप मै बिन बेटे कि औरत का मजाक उडाती रहती है
हथौडा
" यह बात अक्सर लोग सुनाते है कि औरतो के अनेक रुप है लेकिन यह ना भुले वो रुप मर्दो के साथ होने से हि बनते है "









4 Comments:
शुक्रिया अतुलजी का, जिन्होने "रंग दे बसंती" वाली पोस्ट मे मेरे इस ब्लोग को बेहतर बनाने के लिये टिप्पणी दी| लेकिन मैं आमिर खान पर दी गयी टिप्पणी का अस्वीकार करता हु :)|
और रवि भाई, साथ ही सोचने वाली बात यह है कि ये तथाकथित "फ़ेमिनिस्ट" औरतें भूल जाती हैं कि यदि औरत बिन पुरूष अधूरा है तो पुरूष बिना औरत भी असम्पूर्ण है। या दिर अमेज़ोन की औरतों जैसी सोच रखने वाली ये "फ़ेमिनिस्ट" यह सोचती हैं कि इनका निर्वाह भी पुरूषों बिना हो सकता है?
आपका यह कहना भी सही है कि औरतों पर होते अत्याचार के लिए केवल पुरूष ही दोषी नहीं ठहराए जा सकते। मैंने कहीं पढ़ा था कि किसी महापुरूष ने कहा था कि हर झगड़े की जड़ कोई न कोई औरत ही होती है। यह बात विचारणीय भी लगती है क्योंकि यदि भारतीय इतिहास को देखा जाए तो कहीं न कहीं हर छोटी बड़ी लड़ाई की जड़ में कोई न कोई औरत मिल ही जाएगी। कदाचित् इसलिए हिन्दु धर्म में औरत को शक्ति माना गया है, जो कि बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है।
और रही बात उस "फ़ेमिनिस्ट" की, तो उसकी बातों पर ध्यान न दीजिए, सरफ़िरों कि दुनिया में कमी नहीं है, और फ़िर पाग़लपन किसी की जाति, लिंग गोत्र आदि देखकर तो नहीं आता न!! ;)
औरतो को आज तक कोई नही समझ सका है. शायद भगवान ने भी निर्माण के बाद सोचा हो कि ये क्या बला है? :-)
इसे अन्यथा ना ले. ये सही है कि पुरूष और स्त्री एक दुसरे के पूरक है. पर एक बात यह भी है कि दोनो कि विचार शक्ति तथा तर्क बोध मे काफी अंतर होता है. यह स्वभावगत है. कोई वस्तु पुरूष के लिए एक मायने रखती है तो औरतो के लिए दुसरा मायने रखती है. बात इतनी सी है कि दोनो ही दोनो के बीना निभा भी नही सकते और साथ रह भी नही सकते.
इसी तरह की किसी चर्चा पर किसी को कह्ते सुना था कि अगर औरतें ही औरतों के खिलाफ हो जाती हैं तो उसके पीछे भी तो पुरुष प्रधान समाज है | आखिर औरतों की मानसिकता भी तो इसी पुरुष प्रधान समाज द्वरा ही प्रभावित होती है |
माफ कीजिएगा, न तो मैं पुरुष विरोधी हूँ, न ही 'फेमिनिस्ट' ! पर यह बात सही लगती है | आज भी कितनी औरतें हैं जिन्हें अपना स्वतंत्र विचारधारा बनाने का मौका मिलता है या अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार मिलता है ? यह बात विचार करने योग्य है |
जहाँ तक भिन्नता का सवाल है, तो प्रकृति ने ही स्त्री और पुरुष को अलग-अलग शायद इसीलिये बनाया है ताकि दोनों एक दूसरे के पूरक हो सकें | जो गुण या शक्ति एक में अधिक है वो दूसरे में कम और यही बात कमियों और कमज़ोरियों पर भी लागू होती है | स्त्री हो या पुरुष, कोई सर्व-गुण-समपन्न तो नही होता | और जहाँ तक फेमिनिस्ट विचारधारा का सवाल है, या किसी भी विचारधारा का सवाल है, हर कोई अपनी विचारधार रखने के लिये स्वतंत्र है ! क्या सभी पुरुषों की समान विचारधारा होती है ??
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